बिहार में मतदाता सूची संशोधन को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (8 सितंबर)को अहम फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड को मतदाता सूची में नाम जुड़वाने या हटवाने के लिए पहचान पत्र के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन इसे भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि आधार कार्ड को अब मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया के तहत पहचान साबित करने वाले दस्तावेजों की सूची में 12वें दस्तावेज़ के रूप में जोड़ा जाए। यह निर्णय जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों के अनुरूप है, जिसमें विभिन्न पहचान पत्रों को मान्य दस्तावेज़ के तौर पर स्वीकार करने की अनुमति है।
हालांकि अदालत ने यह भी दोहराया कि पहचान और नागरिकता में कानूनी अंतर है। अदालत ने स्पष्ट कहा, “हम स्पष्ट करते हैं कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है और इसे नागरिकता के दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि चुनाव से जुड़ी प्राधिकारियां, जैसे अन्य पहचान पत्रों की जांच करती हैं, उसी तरह आधार कार्ड की प्रामाणिकता और सत्यता की जांच करने की स्वतंत्रता रखेंगी। अदालत ने कहा, “आधार कार्ड को 12वें दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाए। हालांकि, इसकी प्रामाणिकता की जांच करने का अधिकार अधिकारियों के पास रहेगा। नागरिकता साबित करने के लिए इसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। चुनाव आयोग (ECI) इस संबंध में आज ही आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेगा।”
सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग (ECI) ने भी अदालत को आश्वस्त किया कि आधार को कानूनी प्रावधानों के मुताबिक स्वीकार किया जाएगा। अब आयोग से उम्मीद है कि वह बिहार के चुनावी अधिकारियों के लिए औपचारिक दिशानिर्देश जारी करेगा, ताकि इस आदेश को लागू किया जा सके।
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