“हमें पीओके चाहिए और बहुत जल्द लेकर रहेंगे” जगद्गुरु रामभद्राचार्य का हुंकार

रामभद्राचार्य ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत की सैन्य शक्ति और रणनीतिक संकल्प का प्रतीक बताया और कहा कि यह केवल पाकिस्तान के लिए ही नहीं, बल्कि विश्वभर के आतंक समर्थक राष्ट्रों के लिए भी एक संदेश है।

“हमें पीओके चाहिए और बहुत जल्द लेकर रहेंगे” जगद्गुरु रामभद्राचार्य का हुंकार

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित संस्कृत के महान विद्वान जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने शुक्रवार को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता पर भारतीय सेना की जमकर सराहना करते हुए पाकिस्तान पर तीखा हमला बोला। उन्होंने विश्वास के साथ कहा, “हमें पीओके चाहिए और हमें यह बहुत जल्द मिलेगा।”

आईएएनएस को दिए गए एक विशेष इंटरव्यू में रामभद्राचार्य ने कहा कि पाकिस्तान को चेत जाना चाहिए। “पाकिस्तान की इस बार ऐसी पिटाई हुई है कि उसे उबरने में सैकड़ों साल लगेंगे। अगर उसने फिर कोई नापाक हरकत की, तो अंजाम और भी घातक होंगे।”

उन्होंने कहा कि भारतीय सेना का पराक्रम और संयम अद्वितीय है, लेकिन पाकिस्तान जैसे देश के लिए यही एकमात्र भाषा है जिसे वह समझता है। उन्होंने दोहराया, “हम कह रहे हैं कि हमें पीओके चाहिए और हम इसे बहुत जल्द लेकर रहेंगे।” रामभद्राचार्य ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत की सैन्य शक्ति और रणनीतिक संकल्प का प्रतीक बताया और कहा कि यह केवल पाकिस्तान के लिए ही नहीं, बल्कि विश्वभर के आतंक समर्थक राष्ट्रों के लिए भी एक संदेश है।

वहीं, उन्हें हाल ही में 58वां ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर भी देशभर में खुशी का माहौल है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में उन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया। इस मौके पर राष्ट्रपति ने कहा, “दिव्यांग होने के बावजूद, जगद्गुरु ने अपने दिव्य दृष्टिकोण से साहित्य और समाज की सेवा में असाधारण योगदान दिया है।”

इस सम्मान को लेकर रामभद्राचार्य ने कहा, “यह मेरे लंबे संघर्ष का परिणाम है। मैंने 250 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें 150 से अधिक संस्कृत में हैं। चार संस्कृत महाकाव्य भी मेरी रचनाओं में शामिल हैं। यह पुरस्कार मैंने किसी से उधार नहीं लिया, बल्कि इसे अपनी मेहनत से अर्जित किया है।”

साहित्य, समाज और राष्ट्रभक्ति—तीनों क्षेत्रों में जगद्गुरु की यह बुलंद आवाज देश को ना केवल गौरवान्वित करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित भी करती है। POK पर उनका स्पष्ट रुख और सेना पर अडिग विश्वास, इस चुनावी नहीं बल्कि रणनीतिक वर्ष में भारत की बदली हुई सोच का प्रतीक है।

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