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Wednesday, February 11, 2026
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हिंदवी स्वराज्य से अंग्रेजों से संघर्ष तक का साक्षी, कसबा पेठ गणपति !

हिंदू समाज को सुसंगठीत, जागृत करने और दोष मुक्त करने के लिए यहीं से शुरू की गई सार्वजानिक गणेशोत्सव की परंपरा।

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इतिहास और आस्था के संगम पर खड़ा पुणे का कसबा गणपति मंदिर एक धार्मिक धरोहर के साथ ‘हिंदवी स्वराज्य’ की आत्मा और पुणे की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। 17वीं सदी में महारानी जीजामाता द्वारा स्थापित यह मंदिर छत्रपति शिवाजी महाराज की आस्था और हिंदवी साम्राज्य के संकल्प का साक्षी रहा है। यहां के स्वयंभू तांडव रूपी गणेश की प्रतिमा को पुणे का ग्रामदैवत माना जाता है और इसका इतिहास है की छत्रपति शिवाजी महाराज का हर मंगल कार्य इसी गणपति के पूजन से आरंभ होता था। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक कसबा के बाप्पा का मंदिर पूजन का स्थल के अलावा बल्कि हिंदू सामाज के जागरण, सांस्कृतिक चेतना और गणेशोत्सव परंपरा का आधार रहा है।

पुणे शहर के कसबा पेठ क्षेत्र में स्थित कसबा गणपति मंदिर की स्थापना 17वीं सदी के आरंभिक वर्षों (लगभग 1630 के दशक) में की गई। मुगलों के विरोध से अंग्रेजी सत्ता और सामाजिक अन्याय से प्रेरित शिवाजी महाराज ने पुणेवासियों के उद्धार के लिए सभी जनजातियों को संगठित किया, उस दौर की शुरुवात महारानी जीजाबाईं द्वारा कसबा गणपति मंदिर की स्थापना के बाद ही हुई।

दरअसल छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ जिजामाता जब पुणे में आई तब उन्होंने पुणे को बरबाद हुआ पाया। आदिलशाह के सरदारों ने पुणे को ध्वस्त किया था, जलाकर राख़ कर दिया था। आदिलशाह के सरदारों ने पुणे को अपवित्र करने के उद्देश्य से यहां गधे को हल से बांधकर जुताई की, जिसे पुणे को अपवित्र मानते हुए, बहुसंख्य पुणेवासी विस्थापन कर गए। इस कालखंड के बाद आदिलशाह ने छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता शाहजी भोसले, जो आदिलशाह के सरदार थे, उन्हें पुणे सौंप दिया। 1636 में शाहजी भोसले ने पुणे में लालमहल बनवाया, जहां जिजामाता और छत्रपति शिवाजी महाराज को उन्होंने भेजा, साथ ही शाहजी भोसले ने उन्हें पुणे का कार्यभार संभालने की जिम्मेदारी दी थी।

जिजामाता ने पाया की पुणे में इस्लामी बर्बरता और आक्रमण के कारण यहां एक भी मंदिर नहीं था। माता जिजाऊ ने तुरंत ही छत्रपति शिवाजी महाराज के बाल हाथों में सोने हल देकर पुणे जमीन की जुताई की, जिससे लोगों ने पवित्र सन्देश माना। इसके साथ ही जिजामाता को स्वप्नदृष्टि में स्वयंभू गणेश प्रतिमा का दर्शन हुआ उन्होंने  पुणे वासियों को भगवान को ढूंढने का आदेश दिया। दौरान लाल महल के करीब ही ठाकर वाडा के पीछे स्वयंभू गणेश मूर्ति मिली, उन्होंने लालमहल के समीप उस मूर्ति की स्थापना कर मंदिर निर्माण कराया।

कुछ स्रोतों में उल्लेख है कि और उसी काल में जीजाबाईं ने गणपति मूर्ति की स्थापना कर मंदिर की नींव रखी। इस प्रकार कसबा गणपति मंदिर पुणे के विकास के आरंभिक चरण से जुड़ा हुआ है और इसे नगर का ग्रामदैवत माना जाता है।

कसबा गणपति मंदिर का निर्माण और संरक्षण छत्रपति शिवाजी महाराज तथा उनकी माता रानी जीजाबाई के साहसिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रेरित था। शिवाजी महाराज ने बाल्यकाल से ही कसबा गणपति में आस्था रखी। वे प्रत्येक सैन्य अभियान से पहले मंदिर में पधारकर भगवान गणेश से विजय की प्रार्थना करते थे। इस प्रकार शिवाजी और जीजाबाई ने इस मंदिर को स्वराज्य की शक्ति और भक्तिभाव का केन्द्र बनाया। लोकमान्यता के अनुसार शिवाजी महाराज का प्रत्येक मंगल कार्य यही गणपति से आरम्भ होता था, इसलिए इनकी पूजा को ‘जयती गणपति’ का मान प्राप्त है।

कसबा गणपति को पुणे का ग्रामदैवत माना जाता है। यह गणपति पुणेवासियों के लिए अत्यंत पावन है और इसे शहर की संस्कृति-परंपरा का अभिन्न अंग माना जाता है। मंदिर की मूर्ति अनूठी है, यह स्वयंभू (तांडव गणेश स्वरूप) है और पारंपरिक रूप से इसमें हीरे-माणिक की जड़ी है। धार्मिक दृष्टि से, यहां की परंपरा है कि विवाह या अन्य शुभ कार्यों में सर्वप्रथम निमंत्रण इसी गणेश को अर्पण किया जाता है। सार्वजनिक गणेशोत्सव में कसबा गणपति को हमेशा पुणे के सभी गणपती में पहला मान मिलता है। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा दर्शाती है कि कसबा गणपति पुणेवासियों की आस्था और स्थानीय पहचान का केंद्र रहा है। वर्तमान में भी लाखों श्रद्धालु यहां प्रतिवर्ष दर्शन-पूजन करते हैं। इसे पुणे का प्रमुख गणपति कहा जाता है।

स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कसबा गणपति मंदिर और उसके उत्सव ने राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक जागृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोकमान्य बाळ गंगाधर तिलक ने सन 1893 में गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप देकर सर्वजन गणपति बनाया था, ताकि विभिन्न समुदाय एकत्रित होकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट हो सकें। कसबा गणपति मंडल ने भी आरंभ से ही सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाना आरंभ कर दिया और इस गणेश को पुणे का पहला गणपति मानकर विसर्जन मेले में पहली बार सामूहिक विसर्जन का अधिकार दिया गया। तिलक ने विशेष रूप से कसबा गणपति को पुणे की प्रथम गणेश प्रतिमा की प्रतिष्ठा दी, जिससे गणेशोत्सव राष्ट्रीय चेतना का मंच बन गया। गणेशोत्सव के माध्यम से छुआ-छूत, वर्णभेद आदि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरण हुआ और गोंधळ समाजिक आंदोलन को भी बल मिला। इस तरह कसबा गणपति मंदिर संगठित सामाजिक आंदोलनों का चिन्ह बन गया और स्वतंत्रता संग्राम में पुणे के जनमानस को दिशा दी।

आज कसबा गणपति मंदिर उसी जीवंतता और महत्त्व के साथ खड़ा है। श्री कसबा गणपति मंडल के तत्वावधान में दस दिवसीय गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवधि में मंदिर परिसर व आसपास सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाट्य-नृत्य तथा सामाजिक जागरूकता शिविर आयोजित किए जाते हैं। कसबा गणपति मंडल समाज कल्याण की गतिविधियों में भी सक्रिय है। यह ग्राम विकास, शिक्षा, छात्रवृत्ति, महिला सशक्तिकरण और पुस्तकालय संचालन जैसे सामाजिक कार्य करता है। उत्सव के अंतर्गत गणपति विसर्जन तक कसबा गणपति की अगुवाई रहती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। कुल मिलाकर, कसबा गणपति मंदिर आज भी पुणेवासियों के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन की धुरी बना हुआ है।

कसबा गणपति पुणे के सार्वजनिक गणेशोत्सव में ‘मानाचा पहिला गणपती’ अर्थात पहला सन्मान प्राप्त गणपति माना जाता है। परंपरा के अनुरूप, यहां के गणेशोत्सव को प्रमुख सम्मान प्राप्त है और इसका प्रतिवर्ष विसर्जन क्रम सबसे पहले होता है। लोकमान्य तिलक ने इसे भी सांकेतिक महत्व दिया था, इसलिए पुणे की गणेशोत्सव शोभा यात्राओं में कसबा गणपति सर्वप्रथम गणपति के रूप में मान्यता में रहता है।

दस दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में मूर्तिपूजा के साथ-साथ पारंपरिक झांकियां और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ आयोजित की जाती हैं, जिससे पुणे की विविध कला और सामाजिक चेतना को प्रवर्धन मिलता है। अंततः दसवें दिन विशाल उत्सव के साथ गणेशजी का विसर्जन होता है, जिसे कसबा गणपति की अगुवाई में लाखों श्रद्धालुओं द्वारा देख-देखी पुनीत माना जाता है। इन सब परंपराओं के कारण कसबा गणपति मंदिर पुणे के गणेशोत्सव की परम्परा का केंद्र बना हुआ है।

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