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रूस ने 75 चूहों को अंतरिक्ष में भेजा, जानिए क्यों

शोधकर्ताओं ने चूहों को तीन अलग-अलग समूहों में बांटा है, एक समूह पृथ्वी पर सामान्य परिस्थितियों में रहेगा। दूसरा समूह पृथ्वी पर रखे गए फ्लाइट हार्डवेयर में रहेगा। तीसरा समूह अंतरिक्ष में वास्तविक कक्षा में प्रयोग का हिस्सा बनेगा।

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रूस ने अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए बुधवार (20 अगस्त) को अपने नवीनतम Bion-M No.2 बायोसैटेलाइट के जरिए 75 चूहों को अंतरिक्ष में भेजा है। यह मिशन एक महीने तक निम्न-पृथ्वी कक्षा (Low-Earth Orbit) में रहेगा और इसका उद्देश्य यह समझना है कि अंतरिक्ष यात्रा जीवित प्राणियों के शरीर और स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करती है। इस प्रयोग का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि इसके परिणाम भविष्य में चंद्रमा और मंगल ग्रह पर मानव मिशनों की तैयारी के लिए बेहद अहम साबित होंगे।

चूहों के अलावा इस बायोसैटेलाइट में 1,000 से अधिक फ्रूट फ्लाई, पौधों के बीज और विभिन्न सूक्ष्मजीव भी शामिल किए गए हैं। चूहों के लिए खासतौर पर एक “मिनी माउस होटल” तैयार किया गया है, जिसमें खाने-पीने, अपशिष्ट निपटान, कैमरे और सेंसर जैसी आधुनिक सुविधाएँ मौजूद हैं। ये सभी उपकरण धरती पर मौजूद वैज्ञानिकों को रीयल-टाइम डेटा भेजेंगे।

कुछ चूहों के शरीर में माइक्रोचिप्स प्रत्यारोपित किए गए हैं ताकि उनके हार्मोन स्तर, रोग प्रतिरोधक क्षमता और मेटाबॉलिज्म जैसी शारीरिक प्रक्रियाओं को अंतरिक्षीय परिस्थितियों में परखा जा सके। इस मिशन में सामान्य प्रयोगशाला चूहों के साथ-साथ जेनेटिकली मॉडिफाइड “नॉकआउट” माइस भी शामिल हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक प्रणाली खासतौर पर विकिरण (Radiation) से लड़ने के लिए बदली गई है।

Bion-M No.2 की ध्रुवीय कक्षा (Polar Orbit) चूहों को ऐसे विकिरण स्तरों के संपर्क में लाएगी जो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की तुलना में लगभग 30% अधिक हैं। यह बिल्कुल वैसा ही वातावरण तैयार करता है जैसा इंसानों को गहरे अंतरिक्ष मिशनों के दौरान झेलना पड़ सकता है।

इसी कारण से शोधकर्ताओं ने चूहों को तीन अलग-अलग समूहों में बांटा है, एक समूह पृथ्वी पर सामान्य परिस्थितियों में रहेगा। दूसरा समूह पृथ्वी पर रखे गए फ्लाइट हार्डवेयर में रहेगा। तीसरा समूह अंतरिक्ष में वास्तविक कक्षा में प्रयोग का हिस्सा बनेगा। इनकी तुलना वैज्ञानिकों को समझने में मदद करेगी कि कौन-सी जैविक परिवर्तन वास्तव में माइक्रोग्रैविटी और कॉस्मिक रेडिएशन से हो रहे हैं और कौन-से केवल बंद वातावरण में रहने के कारण।

इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य यह जानना है कि माइक्रोग्रैविटी और अंतरिक्ष विकिरण इंसानों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और शारीरिक प्रणाली को किस हद तक प्रभावित करते हैं। इसके परिणामों से वैज्ञानिक भविष्य के लिए मेडिकल प्रोटोकॉल, सुरक्षा उपाय और नई सामग्री विकसित करेंगे। इसके साथ ही इस मिशन में लूनर सॉइल सिमुलेंट्स (चंद्रमा जैसी मिट्टी के नमूने) का भी परीक्षण किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वह कक्षा में कितनी टिकाऊ साबित होती है। यह प्रयोग चंद्रमा पर भविष्य में निर्माण कार्यों के लिए उपयोगी साबित होगा।

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