ज्यादातर कारों में आज भी हैलोजन हेडलाइट और फॉग लाइट क्यों इस्तेमाल होती हैं, LED क्यों नहीं?

ज्यादातर कारों में आज भी हैलोजन हेडलाइट और फॉग लाइट क्यों इस्तेमाल होती हैं, LED क्यों नहीं?

Why do most cars still use halogen headlights and fog lights, and not LEDs?

मुंबई, दिल्ली या महाराष्ट्र के किसी छोटे शहर के कार शोरूम में जाइए, एक चीज़ लगभग हर बजट और मिड-रेंज कार में समान दिखेगी, हल्की पीली रोशनी वाली हेडलाइट्स और फॉग लाइट्स। Maruti Suzuki, Hyundai, Tata Motors और Mahindra & Mahindra जैसे ब्रांड आज भी अपने बेस और मिड वेरिएंट्स में हैलोजन बल्ब ही देते हैं। वहीं, तेज सफेद LED लाइट्स ज़्यादातर टॉप मॉडल्स, प्रीमियम SUVs या इलेक्ट्रिक कारों में ही देखने को मिलती हैं। सवाल यह है कि ऐसा क्यों? वजह LED की कमी नहीं, बल्कि लागत, नियम और भारतीय सड़कों की हकीकत है।

सबसे पहले आसान भाषा में फर्क समझिए। हैलोजन हेडलाइट पुराने बल्ब की तरह काम करती है, एक पतली तार (फिलामेंट) बिजली से गर्म होकर पीली-सफेद रोशनी देती है। यह तकनीक दशकों पुरानी और बेहद सरल है। दूसरी तरफ LED (Light Emitting Diode) में छोटे इलेक्ट्रॉनिक चिप्स होते हैं, जो तुरंत जलते हैं, तेज सफेद रोशनी देते हैं, कम बिजली खर्च करते हैं और 10–20 गुना ज्यादा चलते हैं।

तो फिर LED हर कार में क्यों नहीं?
सबसे बड़ी वजह है पैसा। भारत दुनिया के सबसे ज्यादा कीमत-संवेदनशील बाजारों में से एक है। यहां ₹6 लाख से ₹12 लाख के बीच की कारें सबसे ज्यादा बिकती हैं। सही LED सेटअप (प्रोजेक्टर और वायरिंग के साथ) लगाने से हर कार की लागत कई हजार रुपये बढ़ जाती है। लाखों कारें बेचने वाली कंपनियों के लिए यह रकम करोड़ों में पहुंच जाती है। इसलिए कीमत कम रखने के लिए कंपनियां सस्ते हैलोजन ही चुनती हैं। जहां हैलोजन बल्ब ₹200–500 में बदल जाता है, वहीं LED यूनिट 5–10 गुना महंगी पड़ सकती है।

दूसरी वजह है नियम (रेगुलेशन)। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) और सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के नियमों के अनुसार हैलोजन और LED दोनों ही मान्य हैं, बशर्ते वे तय ब्राइटनेस और ग्लेयर मानकों को पूरा करें। कोई ऐसा नियम नहीं है कि हर नई कार में LED अनिवार्य हो। हैलोजन आसानी से इन मानकों पर खरे उतरते हैं और सस्ते भी हैं। उल्टा, कई आफ्टरमार्केट LED बल्ब जो पुरानी हैलोजन लाइट्स में लगाए जाते हैं, वे अवैध या खतरनाक हो सकते हैं क्योंकि वे रोशनी को गलत तरीके से फैलाकर सामने वाले ड्राइवर को चकाचौंध कर देते हैं।

तीसरी बड़ी वजह है सुविधा और उपलब्धता। भारत में कहीं भी रात में हाईवे पर निकल जाइए, हर छोटे-मोटे मैकेनिक या बैटरी दुकान पर हैलोजन बल्ब आसानी से मिल जाएगा। खराब होने पर कुछ ही मिनटों में ₹200–500 में बदल जाता है। LED यूनिट्स अभी इतने सस्ते या हर जगह उपलब्ध नहीं हैं, खासकर छोटे शहरों और गांवों में। इसके अलावा भारत की धूल, गर्मी और नमी वाले माहौल में साधारण तकनीक ज्यादा भरोसेमंद साबित होती है।

फॉग लाइट्स का मामला भी कुछ ऐसा ही है। ज्यादातर बजट कारों में या तो फॉग लाइट्स नहीं होतीं या हैलोजन वाली होती हैं। क्योंकि फॉग लाइट अनिवार्य नहीं हैं, कंपनियां यहां भी लागत बचाती हैं। कुछ नई कारों में अलग फॉग लाइट्स की जगह LED DRLs (Daytime Running Lights) दिए जा रहे हैं, लेकिन यह सुविधा भी आमतौर पर टॉप वेरिएंट्स में ही मिलती है।

बेशक, LED के फायदे साफ हैं, बेहतर रोशनी, लंबी उम्र, कम बिजली खपत और कम रखरखाव। यही वजह है कि Tata Nexon के टॉप वेरिएंट्स, Hyundai Creta या नई इलेक्ट्रिक कारों में LED तेजी से आम हो रही हैं। जैसे-जैसे LED सस्ती होंगी और लोग ज्यादा फीचर वाले वेरिएंट खरीदेंगे, इनका इस्तेमाल और बढ़ेगा।

लेकिन आज भी आम भारतीय खरीदार के लिए सबसे बड़ा सवाल होता है, “कितना अतिरिक्त खर्च?” जब तक LED सस्ती नहीं हो जाती या नियम उन्हें अनिवार्य नहीं बनाते, तब तक हैलोजन लाइट्स भारतीय सड़कों पर आम बनी रहेंगी। LED का दौर आ रहा है, लेकिन हर कार तक पहुंचने में अभी समय भी लगेगा और अतिरिक्त पैसा भी खर्चना होगा। इसीलिए भारतीय कारों में हैलोजेन बेहतर है।

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