महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रस्तावित “महाराष्ट्र देवस्थान इनाम उन्मूलन (ड्राफ्ट) अधिनियम, 2026” को लेकर राज्यभर में विवाद गहराता जा रहा है। कई हिंदू मंदिर संगठनों, विशेष रूप से महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने इस मसौदा कानून का तीखा विरोध शुरू कर दिया है। संगठन का आरोप है कि यह कानून मंदिरों की ऐतिहासिक और धार्मिक संपत्तियों को किरायेदारों, कब्जाधारियों और निजी व्यक्तियों के हाथों में जाने का रास्ता खोल सकता है।
महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने मौजूदा स्वरूप में यह कानून लागू किया तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। इसी मुद्दे पर महासंघ के प्रतिनिधिमंडल ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक सुनील घनवट ने किया। उनके साथ विधायक प्रताप अडसड और प्रताप पचपुटे भी मौजूद थे।
The proposed 'Maharashtra Devasthan Inam Abolition Draft Act 2026' poses a major difficulty for temple lands and their management. Millions of temple trustees across the state are strongly opposing this law.
In this regard, a memorandum was submitted to the Hon. Chief Minister… pic.twitter.com/eQl42s2t0m
— Sunil Ghanwat 🛕🛕 (@SG_HJS) May 15, 2026
क्या हैं देवस्थान इनाम भूमि?
देवस्थान इनाम भूमि वे जमीनें हैं जो ऐतिहासिक रूप से मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं और धर्मार्थ संस्थानों को पूर्व शासकों द्वारा दान या अनुदान के रूप में दी गई थीं। इनमें कई जमीनें कर-मुक्त या विशेष राजस्व छूट वाली थीं। मसौदा कानून के अनुसार, इसमें गांवों, गांव के हिस्सों, भूमि राजस्व अधिकारों और कर-मुक्त जमीनों को शामिल किया गया है।
हालांकि, प्रस्तावित कानून में हैदराबाद एबोलिशन ऑफ इनाम्स एंड कैश ग्रांट्स एक्ट 1954, हैदराबाद अतियात इन्क्वायरी एक्ट 1952 और वक्फ एक्ट 1995 के तहत आने वाली जमीनों को बाहर रखा गया है। वक्फ संपत्तियों को छूट दिए जाने का मुद्दा अब इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक और धार्मिक केंद्र बन गया है।
मंदिर संगठनों की आपत्ति क्या है?
महाराष्ट्र मंदिर महासंघ का कहना है कि मंदिरों की संपत्ति कानूनी रूप से देवता की होती है और इसे न तो ट्रस्टी और न ही राज्य सरकार किसी अन्य को हस्तांतरित कर सकती है। संगठन का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई फैसलों में मंदिरों को एक ज्यूरिडिकल एंटिटी यानी कानूनी इकाई माना गया है, जिसके संपत्ति अधिकार संरक्षित हैं।
सुनील घनवट ने कानून को लेकर तीन प्रमुख आपत्तियां उठाईं। पहली, उनका कहना है कि महाराष्ट्र सरकार स्वयं देवस्थान भूमि की मालिक नहीं है, इसलिए उसे मंदिर संपत्ति के हस्तांतरण का कानून बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। दूसरी, उन्होंने कहा कि कई मंदिरों की जमीनें सदियों पुरानी हैं और संभव है कि वे हिंदीवी साम्राज्य के अधिपती छत्रपति शिवाजी महाराज और अन्य हिंदू राजवंशों द्वारा दान में दी गई हों। उनके अनुसार, यह कानून ऐतिहासिक धार्मिक संपत्तियों को निजी व्यक्तियों के हाथों में पहुंचा सकता है।
तीसरी और सबसे गंभीर आपत्ति वक्फ संपत्तियों को कानून से बाहर रखने को लेकर जताई गई है। महासंघ का कहना है कि जहां हिंदू मंदिरों की जमीनों को पुनर्गठित और हस्तांतरित करने की तैयारी है, वहीं वक्फ संपत्तियों को विशेष संरक्षण दिया गया है। संगठन ने इसे असमान व्यवहार बताया है।
प्रस्तावित कानून की धारा 3 के तहत देवस्थान इनामों को समाप्त करने और उनसे जुड़े पारंपरिक अधिकार खत्म करने का प्रावधान है। वहीं धारा 4 में अधिकृत धारकों, मिरासदारों, किरायेदारों और खेती करने वाले अन्य धारकों को “Occupant Class-I” अधिकार देने की बात कही गई है, जिससे उन्हें मालिकाना हक जैसे अधिकार मिल सकते हैं।
कानून में 1 जनवरी 2011 से पहले कब्जे में रहने वाले “अनधिकृत धारकों” को भी कुछ शर्तों के तहत जमीन पुनः आवंटित करने का प्रावधान है। आलोचकों का कहना है कि इससे पुराने अतिक्रमण कानूनी रूप से वैध हो सकते हैं।
हालांकि, कानून में अवैध कब्जों के खिलाफ सख्त प्रावधान भी जोड़े गए हैं। धारा 7 और 8 में अवैध कब्जे को अपराध मानते हुए दो से पांच साल तक की सजा और जमीन के बाजार मूल्य तक जुर्माने का प्रावधान है। इसके साथ ही कलेक्टर को त्वरित बेदखली का अधिकार देने की बात भी कही गई है।
संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा
महाराष्ट्र मंदिर महासंघ का कहना है कि यह मसौदा कानून संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता), अनुच्छेद 26 (धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार) और अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
संगठन का तर्क है कि मंदिरों की आय से पूजा-पाठ, धार्मिक उत्सव, पुजारियों का वेतन, सामाजिक कार्य और मंदिर प्रशासन चलता है। यदि जमीनों का स्वामित्व कमजोर हुआ तो मंदिर आर्थिक रूप से प्रभावित होंगे।
महासंघ ने सरकार से मसौदा कानून तुरंत वापस लेने, देवस्थान भूमि को गैर-हस्तांतरणीय घोषित करने, मंदिर भूमि के लिए सख्त एंटी-लैंड ग्रैबिंग कानून बनाने, पुराने अतिक्रमणों की SIT जांच कराने और छह महीने में विवाद निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग की है।
फिलहाल यह मसौदा कानून सार्वजनिक सुझावों और आपत्तियों के लिए जारी किया गया है। राज्य सरकार ने 5 जून 2026 तक नागरिकों और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे हैं। आने वाले समय में सरकार कानून में संशोधन कर सकती है, इसे टाल सकती है या विधानसभा में पेश कर सकती है। लेकिन मंदिर संगठनों के तीखे विरोध और वक्फ तुलना के कारण यह मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा धार्मिक और राजनीतिक विवाद बनता दिखाई दे रहा है।
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