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पाकिस्तान के जनरल भी न्यूक्लियर साइंटिस्ट A.Q. खान के पेरोल पर थे: पूर्व CIA अधिकारी का बड़ा खुलासा

‘मर्चेंट ऑफ डेथ’ नेटवर्क को कैसे किया गया ध्वस्त—जेम्स लॉलर ने किया खुलासा

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पाकिस्तान के कुख्यात परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल क़दीर खान के वैश्विक न्यूक्लियर तस्करी नेटवर्क को दुनिया की सबसे खतरनाक अवैध सप्लाई चेन कहा जाता था।अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के पूर्व अधिकारी जेम्स लॉलर ने इस नेटवर्क के पर्दाफाश की कहानी और पाकिस्तान की सेना की इस तस्करी में मिलीभगत के चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।

जेम्स लॉलर ने 30 वर्षों तक परमाणु प्रसार रोकने से जुड़ी गुप्त मिशन ओर काम किया है। उन्होंने हाल ही में ANI को दिए इंटरव्यू में बताया कि A.Q. खान का नेटवर्क इतना व्यापक था कि ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया जैसे देशों को पाकिस्तान का परमाणु प्रोग्राम का विज्ञानं बेचा जा रहा था और इस काम में कुछ पाकिस्तानी जनरल और उच्च अधिकारी भी खान के पेरोल पर थे।

लॉलर के अनुसार, इस तस्करी में असली मोड़ तब आया जब CIA ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ को “पूरी तरह ठोस सबूत” दिखाए कि खान विदेशी सरकारों को पाकिस्तान की परमाणु तकनीक बेच रहा है। CIA डायरेक्टर जॉर्ज टेनेट ने खुद मुशर्रफ को बताया कि खान लीबियाई और शायद अन्य देशों को संवेदनशील राज सौंप रहा था।

लॉलर ने बताया कि यह सुनते ही मुशर्रफ भड़क उठे और कहा, “I’m going to kill that son of a bit*h.”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुशर्रफ और खान के संबंध हमेशा से खराब थे। इसके बाद मुशर्रफ ने खान को वर्षों तक नज़रबंदी में रखा, जिसे लॉलर तस्करी नेटवर्क को बंद करने के पिछे का निर्णायक कदम बताते हैं।

लॉलर ने कहा कि शुरू में एजेंसियां खान के नेटवर्क के पैमाने को समझ ही नहीं पाईं। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के लिए चोरी-छिपे तकनीक जुटाने वाला यह नेटवर्क बाद में दुनिया भर में परमाणु तकनीक बेचने वाली अंतरराष्ट्रीय स्मगलिंग मशीन बन गया। “मैंने ही खान को ‘Merchant of Death’ कहा था,” लॉलर ने बताया। तीन दशक तक चल रहे इस नेटवर्क में अल्ट्रा-सेंसिटिव सेंट्रीफ्यूज तकनीक, ब्लूप्रिंट, यूरेनियम संवर्धन से जुड़ा अत्याधुनिक उपकरण बेचा जा रहा।

अमेरिकी और सहयोगी एजेंसियों ने जर्मन कार्गो जहाज़ BBC China को पकड़ने से तस्करी नेटवर्क का सबसे बड़ा भांडाफोड़ हुआ। कंटेनरों में न्यूक्लियर कंपोनेंट्स से भरा माल मिला—जिससे लीबिया के गुप्त परमाणु कार्यक्रम का पर्दाफाश हुआ। लॉलर ने बताया कि सामग्री देखकर लीबियाई अधिकारी अवाक रह गए और कुछ देर बाद बोले,
“अल्लाह की कसम, आप सही कह रहे हैं। हमारा परमाणु कार्यक्रम ज़रूर था।”

लॉलर के अनुसार 1990 के दशक के मध्य में उन्हें खान के यूरोप स्थित नेटवर्क को “घुसपैठ कर नष्ट” करने की जिम्मेदारी मिली। उनकी छोटी, अत्यंत गोपनीय टीम ने फर्जी कंपनी, सप्लायर का नकली रूप, क्लासिक स्टिंग ऑपरेशन, और तकनीकी तोड़फोड़ (sabotage) के जरिए नेटवर्क के अंदर घुसने की रणनीति अपनाई। लॉलर ने कहा,“अगर आप प्रसार रोकना चाहते हैं, तो आपको खुद प्रसारकर्ता जैसा बनकर नेटवर्क के भीतर घुसना पड़ता है।” उनकी टीम 10 से भी कम सदस्यों की थी, जिनके साथ विदेशों में तैनात बहुत बहादुर अधिकारी काम कर रहे थे।

लॉलर ने चेतावनी दी कि अगर ईरान ने परमाणु हथियार हासिल कर लिए, तो मध्य-पूर्व में “परमाणु महामारी” की स्थिति पैदा हो सकती है, जहाँ दूसरे देश भी अपना परमाणु डिटरेंट विकसित करने की होड़ में लग जाएंगे। यह स्थिति क्षेत्र को सबसे खतरनाक रणनीतिक संकट में धकेल देगी।

लॉलर के नए दावे पाकिस्तान के उस लंबे विवादित इतिहास को और मजबूती देते हैं जिसमें सेना, ISI और राजनीतिक नेतृत्व पर परमाणु तस्करी नेटवर्क को वर्षों तक संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं। उनका कहना है कि A.Q. खान सिर्फ एक वैज्ञानिक नहीं था, बल्कि एक ऐसा ऑपरेटर था जिसने पाकिस्तान के भीतर उच्च स्तर पर समर्थन खरीद रखा था, और इसी कारण उसका तस्करी नेटवर्क दशकों तक चलता रहा।

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