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आतंकवाद पर पाकिस्तान की स्वीकारोक्ति: भुट्टो और ख्वाजा आसिफ के बयानों ने खोली ऐतिहासिक परतें!

पहलगाम हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा ने ली थी, जो पाकिस्तान के भीतर से संचालित होने वाला प्रतिबंधित आतंकी संगठन है।

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आख़िरकार पाकिस्तान की सत्ता के ऊपरी गलियारों से वह शब्द निकल ही आए, जिन पर दुनिया सालों से इशारा कर रही थी। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि देश का अतीत आतंकवाद से जुड़ा रहा है। यह बयान उस वक्त आया है जब कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी माना था कि उनके देश ने आतंकी संगठनों को समर्थन और फंडिंग दी थी।

बिलावल ने स्काई न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “पाकिस्तान का अतीत है, यह कोई रहस्य नहीं है… हम इससे गुज़रे हैं, हमने इसकी कीमत चुकाई है, हमने बार-बार चरमपंथ का सामना किया है, लेकिन हमने इससे सीखा भी है और आंतरिक सुधार किए हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि, “पाकिस्तान का यह अतीत दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन आज हम उसका हिस्सा नहीं हैं।”

यह बयान उस वक्त और ज्यादा गूंजदार हो गया जब उन्होंने मीरपुर खास की एक रैली में भावनात्मक भाषण देते हुए कहा, “पाकिस्तान अमनपसंद मुल्क है, लेकिन अगर हमारी सरजमीं पर हमला होगा तो हम जवाब देने को भी तैयार हैं। हम जंग का ढोल नहीं पीटते, लेकिन उकसाए जाने पर पूरा पाकिस्तान एकजुट होकर गरज उठेगा।”

बिलावल का यह दोहरा रवैया एक ओर सुधारों की बात करता है तो दूसरी ओर युद्ध की धमकी भी देता है, जो पाकिस्तान की राजनीति में पुराने अंदाज़ का हिस्सा रहा है—एक तरफ आत्मस्वीकृति, दूसरी ओर आक्रामकता।

इससे पहले, एक वायरल वीडियो में रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी स्काई न्यूज़ की पत्रकार याल्दा हकीम से बातचीत में स्वीकार किया था कि, “हमने तीन दशकों तक अमेरिका और पश्चिम के लिए यह गंदा काम किया… हमने सोवियत युद्ध में और फिर 9/11 के बाद की जंग में हिस्सा लिया, और इसकी वजह से हम आज बदनाम हैं। यह हमारी भूल थी।”

इन स्वीकारोक्तियों की पृष्ठभूमि में 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकी हमला है, जिसमें 26 निर्दोष लोग मारे गए। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा ने ली थी, जो पाकिस्तान के भीतर से संचालित होने वाला प्रतिबंधित आतंकी संगठन है।

अब जब पाकिस्तान के उच्च स्तर से खुद यह बात कबूल की जा रही है कि आतंकवाद को कभी उन्होंने ‘उपकरण’ के रूप में इस्तेमाल किया, तो यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक मौका है—पाकिस्तान पर उसकी कथनी और करनी दोनों पर निगरानी और जवाबदेही की मांग करने का।

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