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Monday, May 25, 2026
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भारत का प्रोजेक्ट-76 सबमरीन प्रोग्राम: स्वदेशी नौसैनिक युद्धक क्षमता में ऐसे आएगा क्रांतिकारी बदलाव

प्रोजेक्ट-76 के तहत भारतीय नौसेना को मिलेंगी 12 अत्याधुनिक हंटर-किलर पनडुब्बियां; करीब ₹70,000 करोड़ के इस प्रोजेक्ट से हिंद महासागर में बढ़ेगा भारत का दबदबा

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हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक हरकतों को करारा जवाब देने के लिए भारत ने अपनी अंडरवॉटर मारक क्षमता को पूरी तरह से स्वदेशी और आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। भारत का महत्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट-76’ (Project-76) पनडुब्बी कार्यक्रम स्वदेशी नौसैनिक क्षमता में एक बहुत बड़ी छलांग है। आत्मनिर्भर भारत ढांचे के तहत तैयार किए जा रहे इस फ्लैगशिप प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल पुरानी हो चुकी ‘सिंधुघोष-क्लास’ (रूस निर्मित किलो-क्लास) पनडुब्बियों को बदलना और उनकी जगह नई पीढ़ी की अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक हंटर-किलर पनडुब्बियों को शामिल करना है।

अत्याधुनिक एआईपी और लिथियम-आयन बैटरी से लैस होंगी पनडुब्बियां

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो (Warship Design Bureau) के नेतृत्व में विकसित की जा रही इन पनडुब्बियों का वजन लगभग 3,000 टन होगा। इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसमें इस्तेमाल होने वाली स्वदेशी ‘फ्यूल-सेल आधारित एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन’ (AIP) प्रणाली है। यह तकनीक पनडुब्बी को बिना सतह पर आए लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता देती है।

इस EIP सिस्टम को हाई-कैपेसिटी वाली लिथियम-आयन (Lithium-ion) बैटरियों के साथ जोड़ा जाएगा। पारंपरिक लेड-एसिड बैटरियों की तुलना में लिथियम-आयन बैटरियां तेजी से चार्ज होती हैं, अधिक ऊर्जा घनत्व प्रदान करती हैं और लंबे समय तक बेहतरीन प्रदर्शन सुनिश्चित करती हैं। इन दोनों तकनीकों के मिलन से भारत की यह नई पनडुब्बियां पानी के भीतर लगातार 20 से अधिक दिनों तक पूरी तरह छिपी रहकर गश्त करने में सक्षम होंगी, जो हिंद महासागर जैसे विशाल क्षेत्र में सामरिक बढ़त के लिए बेहद जरूरी है।

वर्टिकल लॉन्च सिस्टम और अचूक स्टील्थ तकनीक

प्रोजेक्ट-76 के तहत बनने वाली पनडुब्बियों के डिजाइन में अत्याधुनिक स्टील्थ (अदृश्य रहने की) तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे इनका एकॉस्टिक सिग्नेचर (पानी के भीतर होने वाली आवाज) बेहद कम हो जाएगा। इसके चलते दुश्मन के सोनार या युद्धपोत इन्हें आसानी से ट्रैक नहीं कर पाएंगे।

हमले की क्षमता को घातक बनाने के लिए इसमें वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS) लगाया जाएगा। इस सिस्टम के जरिए पनडुब्बी पानी के भीतर से ही दुश्मन के जमीनी ठिकानों पर लंबी दूरी की लैंड-अटैक क्रूज मिसाइलें दाग सकेंगी। इसके अलावा, भारी वजन वाले टॉरपीडो से लैस होने के कारण ये रक्षात्मक और आक्रामक दोनों ही भूमिकाओं में अचूक साबित होंगी। यह दोहरी क्षमता भारत को ‘सी-डिनायल’ (दुश्मन को समुद्री रास्ते का इस्तेमाल करने से रोकना) और ‘स्ट्रेटेजिक स्ट्राइक’ (रणनीतिक हमले) दोनों के बेहतरीन विकल्प देगी।

मझगांव डॉक और एलएंडटी मिलकर बनाएंगी 12 पनडुब्बियां; ₹70,000 करोड़ का बजट

इस मेगा प्रोजेक्ट को समय पर पूरा करने के लिए सरकार ने निर्माण कार्य को दो प्रमुख स्वदेशी शिपयार्डों में बांटने की योजना बनाई है। इसके तहत मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) और लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को छह-छह पनडुब्बियों के निर्माण का जिम्मा दिया जाएगा। इस समानांतर उत्पादन दृष्टिकोण का उद्देश्य पनडुब्बियों की डिलीवरी में लगने वाले समय को कम करना है ताकि नौसेना को तय समय सीमा के भीतर ये ताकतवर पनडुब्बियां मिल सकें।

प्रोजेक्ट के लिए साल 2028 के आसपास प्रोडक्शन ऑर्डर जारी होने की उम्मीद है, जबकि पहली पनडुब्बी के 2034 तक नौसेना में शामिल होने की संभावना है। आर्थिक मोर्चे पर, इस पूरे कार्यक्रम की अनुमानित लागत लगभग ₹70,000 करोड़ है, जो इसे भारत के इतिहास के सबसे बड़े रक्षा निवेशों में से एक बनाता है।

INS खांदेरी पर 2026 में होगा समुद्री परीक्षण

प्रोजेक्ट-76 की तकनीकों को पूरी तरह आजमाने और सत्यापित करने के लिए, स्वदेशी एआईपी मॉड्यूल (AIP Module) का समुद्री परीक्षण इसी साल 2026 के अंत में नौसेना की पनडुब्बी INS खांदेरी (INS Khanderi) पर किया जाना निर्धारित है। इस परीक्षण की सफलता के बाद इस तकनीक को नई पनडुब्बियों में सीधे इंटीग्रेट करने का रास्ता साफ हो जाएगा।

चीन-पाकिस्तान को रोकने का मास्टरप्लान

प्रोजेक्ट-76 दरअसल भारत के व्यापक पनडुब्बी आधुनिकीकरण रोडमैप का एक अहम हिस्सा है। सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) द्वारा मंजूर किए गए तीन दशकों के दीर्घकालिक सबमरीन बिल्डिंग पर्सपेक्टिव प्लान के तहत भारतीय नौसेना को कुल 24 नई पनडुब्बियां मिलनी हैं। प्रोजेक्ट-76 इसी योजना का दूसरा चरण है, जो पूरी तरह से स्वदेशी डिजाइन और निर्माण पर केंद्रित है।

वर्तमान में यह प्रोजेक्ट भारत के अन्य दो बड़े कार्यक्रमों के साथ मिलकर नौसेना की कमियों को पूरा करेगा। इनमें पहला ‘प्रोजेक्ट-75I’ (Project-75I) है, जिसके तहत जर्मन डिजाइन वाली एआईपी पनडुब्बियां बनाई जा रही हैं, और दूसरा ‘प्रोजेक्ट-77’ (Project-77) है, जो नौसेना को परमाणु ऊर्जा से चलने वाली स्वदेशी हमलावर पनडुब्बियां (SSN) प्रदान करेगा। इन 12 उन्नत पनडुब्बियों के आने से न केवल भारत की पुरानी संपत्तियां बदली जाएंगी, बल्कि यह हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरेगा।

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