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Thursday, June 25, 2026
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ईडी के फेमा आरोपों से राजेश एक्सपोर्ट्स शेयर में लोअर सर्किट!

बेंगलुरु और मुंबई में कंपनी के कई ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाने के एक दिन बाद, एजेंसी ने कहा कि सपोर्टिंग रिकॉर्ड न होने की वजह से कई क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजैक्शन को वैरिफाई करने में उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

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सेबी की जांच का सामना कर रही राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयर में गुरुवार को 5 प्रतिशत का लोअर सर्किट लगा, जिससे कंपनी का शेयर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) पर फिसलकर 97.02 रुपए पर गया है। इसकी वजह प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से कंपनी पर विदेशों में लेनदेन पर फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के उल्लंघन का आरोप लगाना है।

ईडी के बयान के मुताबिक, राजेश एक्सपोर्ट्स ने सामान्य व्यावसायिक तौर-तरीकों का पालन नहीं किया था और वह आयात, निर्यात, विदेशी निवेश और विदेशी व्यापार के लेनदेन से जुड़े जरूरी दस्तावेज पेश करने में नाकाम रही।

बेंगलुरु और मुंबई में कंपनी के कई ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाने के एक दिन बाद, एजेंसी ने कहा कि सपोर्टिंग रिकॉर्ड न होने की वजह से कई क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजैक्शन को वैरिफाई करने में उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

ईडी ने राजेश एक्सपोर्ट्स के कुल नौ ठिकानों पर छापे मारे थे। ईडी ने बयान में आगे कहा कि कंपनी के पास खातों में दर्ज की गई इन्वेंट्री के मुकाबले असल गोल्ड स्टॉक करीब 40 प्रतिशत कम था।

ईडी की प्रेस रिलीज के मुताबिक, कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों को दिया जा रहा वेतन भी उनके दायित्वों से मेल नहीं खाता है। कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) को 2020 से कोई वेतन नहीं मिला है, जबकि मैनेजिंग डायरेक्टर को केवल 17,000 रुपए प्रति माह का वेतन मिलता है।

सेबी के अंतरिम आदेश के मुताबिक, कंपनियों ने वित्त वर्ष 21 से लेकर वित्त वर्ष 25 तक के लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपए की आय को गलत तरीके से प्रस्तुत किया। कंपनी ने यह अपनी विदेश सब्सिडियरी के माध्यम से किया है, जिसके वित्तीय विवरण पर कोई सार्वजनिक डिस्क्लोजर नहीं दिया गया था।

इसके साथ ही, सेबी ने आरोप लगाया कि मेहता ने कंपनी के पैसो को अपने निजी खातों में ट्रांसफर किया, जिससे शेयरधारकों की संपत्ति में करीब 12,726 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

सेबी के आदेश में आगे आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने बार-बार महत्वपूर्ण अकाउंटिंग सिस्टम, वित्तीय रिकॉर्ड और सहायक दस्तावेजों तक पहुंच प्रदान करने में विफल रही, जिससे जांचकर्ताओं और फोरेंसिक ऑडिटर्स को रिपोर्ट किए गए लेन-देन के एक महत्वपूर्ण हिस्से का स्वतंत्र रूप से सत्यापन करने में बाधा उत्पन्न हुई।

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