आरबीआई ने रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा

महंगाई और पश्चिम एशिया में तनाव के चलते सतर्क रुख

आरबीआई ने रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा

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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शुक्रवार (5 जून) को रेपो दर की घोषणा करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला किया है। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि 3, 4 और 5 जून को आयोजित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों की विस्तृत समीक्षा के बाद यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। साथ ही, केंद्रीय बैंक ने अपनी नीतिगत स्थिति (पॉलिसी स्टांस) को ‘न्यूट्रल’ बनाए रखा है।

गवर्नर मल्होत्रा ने कहा कि अप्रैल की पिछली मौद्रिक नीति बैठक के बाद वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अस्थिर युद्धविराम की स्थिति के कारण ऊर्जा कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिसका असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ रहा है। इससे आर्थिक विकास और महंगाई, दोनों पर दबाव बढ़ा है। उन्होंने कहा कि बढ़ती ऊर्जा लागत और आपूर्ति संबंधी बाधाओं के कारण आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था इन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है और देश की आर्थिक मजबूती बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

आरबीआई के अनुसार, वैश्विक चुनौतियों के बावजूद खुदरा महंगाई (सीपीआई) फिलहाल केंद्रीय बैंक के लक्ष्य स्तर से नीचे बनी हुई है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का पूरा प्रभाव अभी घरेलू बाजारों में दिखाई नहीं दिया है। हालांकि, आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ने की संभावना है और यह आरबीआई द्वारा निर्धारित ऊपरी सीमा के करीब पहुंच सकती है।

गवर्नर ने स्पष्ट किया कि महंगाई से जुड़े जोखिम बढ़ने के बावजूद वर्तमान परिस्थितियों में ब्याज दरों में बदलाव करने के बजाय स्थिति के और स्पष्ट होने का इंतजार करना उचित समझा गया है। आरबीआई महंगाई और आपूर्ति पक्ष से जुड़े दबावों पर लगातार नजर रखेगा तथा आगे के निर्णय उपलब्ध आर्थिक आंकड़ों के आधार पर लिए जाएंगे।

उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रही। निजी उपभोग, निवेश, विनिर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र के मजबूत प्रदर्शन ने इस वृद्धि को समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बावजूद भारत की आर्थिक गतिविधियां अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई हैं। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के पीएमआई सूचकांक दोनों क्षेत्रों में मजबूती का संकेत देते हैं, जबकि औद्योगिक क्षेत्र में भी कारोबारी विश्वास सकारात्मक बना हुआ है।

आरबीआई के मुताबिक, उपभोक्ता खर्च, विशेष रूप से वैकल्पिक या विवेकाधीन खर्च (डिस्क्रेशनरी स्पेंडिंग), अभी भी मजबूत बना हुआ है। बढ़ते खर्च के बावजूद निवेश की गति भी बरकरार है। अप्रैल महीने में भारत के वस्तु निर्यात में भी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई, जबकि वैश्विक स्तर पर परिवहन और बीमा लागत में बढ़ोतरी हुई है।

केंद्रीय बैंक ने चेतावनी दी है कि यदि दक्षिण-पश्चिम मानसून में संभावित कमी रहती है तो कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग प्रभावित हो सकती है। हालांकि, फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, जल भंडारण, जलवायु-अनुकूल खेती और कम अवधि वाली फसलों को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजनाओं के कारण इस प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

गवर्नर ने कहा कि सेवा क्षेत्र की लगातार मजबूती, जीएसटी सुधारों के सकारात्मक प्रभाव और अपेक्षाकृत स्थिर रोजगार स्थिति शहरी उपभोग को समर्थन देती रहेंगी। हालांकि, बढ़ती महंगाई परिवारों की क्रय शक्ति पर कुछ दबाव डाल सकती है।

आरबीआई ने स्पष्ट किया कि वैश्विक अनिश्चितता, बढ़ती ऊर्जा कीमतों और महंगाई के जोखिमों को देखते हुए केंद्रीय बैंक सतर्क रुख बनाए रखेगा। फिलहाल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन आने वाले महीनों में आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार आगे की मौद्रिक नीति तय की जाएगी।

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