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Sunday, February 15, 2026
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बाड़ पर बैठा कौआ है जावेद अख्तर

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लेखक-गीतकार जावेद अख्तर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विहिंप और बजरंग दल को लेकर गंभीर बयान दिए हैं। इन बयानों का पोस्टमार्टम किए जाने की आवश्यकता है। सतही तौर पर देखें, तो अख्तर का बयान तालिबान के खिलाफ लगता है, पर यह सच नहीं है। अख्तर के इतिहास पर नजर डालें तो साफ है कि वह तालिबान पर निशाना दिखा संघ पर तीर चलाते दिखाई पड़ते हैं।

जावेद अख्तर ने क्या कहा ? वह कहते हैं, ‘ तालिबान जंगली हैं और देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विहिंप की मानसिकता तालिबान जैसी है।’ संक्षेप में कहें, तो वे संघ और विहिंप को जंगली बता रहे हैं। अख्तर को अच्छी तरह पता है कि वे जो कह रहे हैं, वह सच नहीं है, क्योंकि अगर ये सच होता, तो इसे कहने की हिम्मत ही नहीं करते। ऐसा कहने पर उन्हें न सिर्फ सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जाता, बल्कि अब तक कब का उन्हें गधे पर बिठा घुमाया गया होता।

अख्तर जैसे तथाकथित प्रगतिशील लोगों को संघ की धारणा को समझने की जरूरत है। इस देश में यदि संघ न होता, तो क्या होता ? मुस्लिमों से घबराने वाले सियासतदांओं की कृपा से मनबढ़ हुए कट्टरपंथी रोजाना हिंदुओं का खून बहाते। पग-पग पर लज्जित करते उन्हें। देखिए, क्या होता है वहां, जहां हिंदुत्व कमजोर होता है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया गया। महाराष्ट्र में मोहर्रम के जुलूस निकल रहे हैं और भगवान गणेश के विसर्जन की शोभायात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

बीते 7 दशकों में संघ के हजारों कार्यकर्ताओं द्वारा किए तप के चलते ही देश में हिंदुओं के हितों का चिंतन करने वाला राजनीतिक प्रवाह मजबूत हुआ। नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन सके। ललाट पर तिलक लगा पर गंगा आरती करने वाला, राम मंदिर का मार्ग प्रशस्तक और देश-विदेश के राष्ट्राध्यक्षों  को भगवद गीता की प्रति भेंट करने वाला प्रधानमंत्री देश को मिला। विदेशी नेताओं को गंगा तट का दृश्य देख कर पता चला कि ताजमहल और अजमेर दरगाह से परे भी इस देश में देखने लायक कुछ है। मोदी सरकार ने 370 की कब्र खोदी। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में पीटे जाने वाले हिंदुओं को नागरिकता देने का  कानून बना।

आज, हिंदू पहले से कहीं ज्यादा संगठित हैं, राजनीतिक रूप से जागरूक हैं। यह बदलाव हरेक क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। बॉलीवुड भी इसका अपवाद नहीं है। इस देश में बीते कई साल से हिंदुओं को सर्वधर्मसमभाव की अफीम दी गई। सभी धर्म एक समान,  हिंदुओं को लगातार दी जाने वाली यह एक और गोली। इसमें बॉलीवुड की भूमिका खासा है। 70 के दशक में और उसके बाद की अमिताभ बच्चन की कुछ सुपरहिट फिल्मों में  जावेद अख्तर और सलीम खान की मधुर जोड़ी का  प्रमुख योगदान रहा है।

मंदिर में जाने से मना करने और  मुसलमानों के लिए पवित्र माने जाने वाले  786 नंबरी बिल्ले को चूम माथे से लगाने वाला हिंदू नायक हमने उनकी ‘ दीवार ‘ में देखा। उनकी फिल्मों में कम-से-कम एक किरदार गुणी-दयालु मुस्लिम है। ‘ जंजीर ‘ में शेर खान, ‘ शोले ‘ में इमाम साहब, ‘ दीवार ‘ में रहीम चाचा, ‘ शान ‘ में अब्दुल आदि…  लंबी फेहरिस्त है। बॉलीवुड में ये लोग सालों से छिपा हुआ एजेंडा चला रहे थे। हिंदू देवी-देवताओं की खिल्ली उड़ाना, साधुओं को ढोंगी और नमाजियों को मानवतावादी दिखाना। कुछ साल पहले तक हिंदी फिल्मों में आतंकवादी कैसा हुआ करता था ? सुभाष घई की ‘ कर्मा ‘ याद है आपको ?  इस फिल्म में डॉ. डेंग नामक विलेन है। इसे आतंकियों का सरगना दिखाया गया है। बॉलीवुड की अख्तर प्रवृत्ति ने दर्शकों को हकीकत से कोसों दूर रख मूर्ख बनाने का काम किया है।

असली आतंकवादी दाढ़ी और टोपी वाले हुआ करते हैं, जेहाद ही उनकी राह है, यह देखने के लिए हमें मणिरत्नम की ‘ रोजा ‘ तक इंतजार करना पड़ा। बॉलीवुड की छत्रपति शिवाजी महाराज को लेकर कभी ममता नहीं जागी, पर अकबर पर फिल्म बनी,चंगेज खान पर फिल्म आई। लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज पर फिल्म बनाने की हिम्मत किसी ने नहीं जुटाई। अफजल खान की अंतड़ियां निकालते हुए दिखाना यहां भला किसे  मुमकिन था ? बॉलीवुड  आज ‘ तानाजी ‘ तक पहुंच चुका है। कल छत्रपति शिवाजी महाराज पर भी फिल्म बनेगी, यह तय है।

आज मुस्लिम आतंकवाद पर खुली चर्चा हो रही है, नक्सलवाद पर फिल्में बन रही हैं। कांग्रेस के आकाओं को बेनकाब करने के लिए फिल्में बनाई जा रही हैं। अब अख्तर जैसे भ्रष्ट प्रगतिशील लोग इससे बुरी तरह बेचैन हैं, तो इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं? जब तक देश में हिंदू बहुसंख्यक हैं, अख्तर प्रवृत्ति प्रगतिशील रहेगी, कल आंकड़ों का समीकरण बदल जाने पर ये शरीयत को सिर पर नाचने से भी बाज नहीं आने वाले। बाड़ पर बैठे इन कौओं के पेट में दर्द इसका है कि देश में हिंदू संगठित हो रहे हैं और मानसिक गुलामी त्याग  रहे हैं।

गंगा-जमुनी तहजीब सिर्फ हिंदुओं को बेवकूफ बनाने की साजिश है। यह राग आलापने वाले मुस्लिमवादी शायर मुनव्वर राणा की शरीयतवादी औलाद के हालिया हिंदुत्ववादियों के बारे में ओके जा रहे जहरीले शब्द सुनें, गंगा-जमुनी तहजीब के मुखौटे का पल में पर्दाफाश हो जाता है। राणा ने भगवान वाल्मीकि और तालिबान की तुलना की थी। अब अख्तर संघ और तालिबान की तुलना कर रहे हैं। इस देश में लोकतंत्र के नाम पर बोलने और भौंकने की आजादी है। चाहे राणा हों या अख्तर, दोनों का भीतरी मकसद हिंदुओं का अपमान करना ही है।

कई लोग जावेद अख्तर के पाकिस्तान व तालिबान विरोधी बयानबाजी की सराहना करते हैं। राष्ट्रवादियों को उनकी इस भूमिका से खुश होने की आवश्यकता नहीं है। देश के विभाजन, पाकिस्तान के निर्माण का विरोध कुछ मुस्लिम नेताओं ने किया था। लेकिन पाकिस्तान का किया उनका विरोध हिंदुओं के प्रति प्रेम के कारण नहीं था। भारत के एक टुकड़े को तोड़ने के बजाय उनकी योजना आबादी बढ़ाकर पूरे हिंदुस्तान को निगलने की थी।

भारत में आज भी ऐसी मानसिकता वाले लोग हैं। वे देश में हिंदू वर्चस्व नहीं चाहते।  उनका सपना हरित भारत का है। इस साजिश को सुचारू रूप से अंजाम देने के लिए वे हिंदुओं को अंतर्धर्मीय सद्भाव का गुड़ लगाने का काम कर रहे हैं। अख्तर उन्हीं में से एक हैं। बाड़ पर बैठे इन कौवे की पहचानने की आवश्यकता है। उनके मुखौटे निकाल फेंकने की जरूरत है। अख्तर को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि हिंदुओं के पराक्रम ने इस देश में मुगल साम्राज्य की कब्र खोद दी।  देश में हिंदुओं की ताकत से खुदवाया गया था। अपनी कलम चलाएं और पेट भरें .तथा बचे-खुचे दिन शांति से बिताएं, हमारा यही कहना है, बस।

(न्यूज डंका के मुख्य संपादक दिनेश कानजी का संपादकीय)

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