नॉर्वे के प्रमुख समाचार पत्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कथित नस्लवादी कार्टून प्रकाशित करने के बाद भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इस कार्टून में पीएम मोदी को एक “सपेरे” के रूप में दिखाया गया था, जिसमें पेट्रोल पंप की पाइप को सांप की तरह दर्शाया गया था। यह चित्र एक राय लेख के साथ प्रकाशित किया गया, जिसका शीर्षक था, “एक चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी”.
यह विवाद उस समय सामने आया जब पीएम मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान आयोजित संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग में नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने उनसे मीडिया के सवाल न लेने को लेकर टिप्पणी की थी। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद पत्रकार ने आवाज लगाते हुए पूछा,”आप दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस से कुछ सवाल क्यों नहीं लेते?” हालांकि इस बात का कोई संकेत नहीं मिला कि प्रधानमंत्री मोदी ने यह टिप्पणी सुनी या उसका जवाब दिया।
इसके बाद प्रकाशित कार्टून ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी। बड़ी संख्या में लोगों ने इसे नस्लवादी और औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित बताया। आलोचकों का कहना है कि यह चित्र भारत को सपेरों के देश जैसी पुरानी पश्चिमी सोच से जोड़ता है।
Shocking. Racist. Derogatory.
Norway’s largest broadsheet newspaper Aftenposten brazens it out with a shocking cartoon depicting Indian PM @narendramodi as a Snake Charmer with the headline: “A sneaky and slightly annoying man”.
They can’t digest India’s rise and success. Pity! pic.twitter.com/g905xHNIWm
— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) May 19, 2026
एक यूजर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा,“यह पत्रकारिता नहीं है। यह औपनिवेशिक ज़माने का नस्लवाद है जिसे कार्टून के रूप में दिखाया गया है। वे भारत की तरक्की को बर्दाश्त नहीं कर सकते, इसलिए वे उन्हीं घिसी-पिटी बातों को अपनाते हैं जो उनके दादा-दादी इस्तेमाल करते थे। हर बार उनका नकाब उतर जाता है।”
एक अन्य यूजर ने लिखा, “यह कार्टून साफ़ तौर पर नस्लवाद है। एक और बात जो सबसे अलग है, वह है इसका मज़ाक। प्रधानमंत्री मोदी पहले कहते थे कि पहले दुनिया भारत को ‘सपेरों की धरती’ समझती थी। और अब, ओस्लो की उनकी यात्रा के दौरान, एक बड़े यूरोपियन अखबार ने उन्हें ठीक उसी तरह दिखाया है।”
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे भारत और उसके लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री का अपमान बताया। एक यूजर प्रैडी ने लिखा, “यूरोपियन लोग अभी भी अपनी कॉलोनियल कल्पनाओं से बाहर नहीं आ पाए हैं, सिंह।”
यह पहली बार नहीं है जब भारत को लेकर इस तरह की छवि सामने आई हो। वर्ष 2022 में भी एक स्पेनिश अखबार ने भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत पर रिपोर्टिंग करते हुए संपेरो वाली छवि का इस्तेमाल किया था, जिसके बाद विवाद खड़ा हो गया था।
प्रधानमंत्री मोदी स्वयं भी कई वैश्विक मंचों पर इस विषय का उल्लेख कर चुके हैं। वर्ष 2014 में अमेरिका के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में दिए गए संबोधन में उन्होंने कहा था कि दुनिया भारत को पहले ‘संपेरो’ के देश के रूप में देखती थी, लेकिन अब भारत “माउस चार्मर्स” यानी तकनीकी विशेषज्ञों और डिजिटल शक्ति के रूप में पहचाना जा रहा है।
इस पूरे विवाद के बीच विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सीबी जॉर्ज ने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रेस व्यवस्था का बचाव किया। उन्होंने कहा, “आप जानते हैं कि यहां (भारत में) कितनी खबरें आती हैं। हमारे यहां हर दिन शाम को बहुत सारी ब्रेकिंग न्यूज़ आती हैं। अकेले दिल्ली में ही कम से कम 200 टीवी चैनल हैं, इंग्लिश, हिंदी और कई भाषाओं में। लोगों को भारत के पैमाने की कोई समझ नहीं है।”
मानवाधिकार और प्रेस स्वतंत्रता को लेकर उठने वाले सवालों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा, “वे (भारत के आलोचक) कुछ बेवकूफ, अज्ञानी NGOs द्वारा पब्लिश की गई एक-दो न्यूज़ रिपोर्ट पढ़ते हैं और फिर आकर सवाल पूछते हैं।”
इस विवाद ने एक बार फिर पश्चिमी मीडिया में भारत की छवि को लेकर बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग इसे केवल एक कार्टून नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक उभरती ताकत के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण के रूप में देख रहे हैं।
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