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रक्षा मंत्रालय में मंथन: होगी ₹3.25 लाख करोड़ के 114 राफेल की सबसे बड़ी डिफेंस डील

भारत से अब तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील

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भारत इस सप्ताह एक बड़े रक्षा सौदे पर औपचारिक विचार-विमर्श की तैयारी कर रहा है। रक्षा मंत्रालय (MoD) फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद से जुड़े प्रस्ताव पर उच्चस्तरीय बैठक में चर्चा करेगा, जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹3.25 लाख करोड़ बताई जा रही है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है और मंजूरी मिलती है, तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा होगा।

सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव के तहत भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए 12 से 18 राफेल विमान ‘फ्लाई-अवे कंडीशन’ में सीधे खरीदे जाने का प्रावधान भी शामिल है, ताकि परिचालन क्षमता को तेजी से मजबूत किया जा सके। बाकी विमानों का निर्माण और एकीकरण ‘मेक इन इंडिया’ ढांचे के तहत किया जाएगा। इस सरकारी-से-सरकारी (G2G) सौदे में भारत फ्रांसीसी पक्ष से यह भी मांग कर रहा है कि राफेल विमानों में भारतीय हथियार प्रणालियों और अन्य स्वदेशी सिस्टम्स का एकीकरण किया जाए, हालांकि विमान के सोर्स कोड फ्रांस के पास ही रहेंगे।

आमतौर पर ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा सौदों में 50 से 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की शर्त होती है, लेकिन राफेल के मामले में यह अनुपात लगभग 30 प्रतिशत रहने की संभावना है। अगर यह सौदा स्वीकृत होता है, तो भारतीय सशस्त्र बलों में राफेल विमानों की कुल संख्या 176 हो जाएगी। भारतीय वायुसेना के पास पहले से 36 राफेल हैं, जबकि भारतीय नौसेना ने पिछले वर्ष 26 राफेल मरीन विमानों का ऑर्डर दिया था।

रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, भारतीय वायुसेना द्वारा तैयार ‘स्टेटमेंट ऑफ केस’ (SoC) कुछ महीने पहले ही मंत्रालय को सौंपा जा चुका है। मंत्रालय की मंजूरी के बाद इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) के सामने रखा जाएगा।

राफेल क्यों?

इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का फैसला ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल विमानों के निर्णायक प्रदर्शन के बाद आया है। इस ऑपरेशन में राफेल ने अपने स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट की मदद से पाकिस्तानी पक्ष द्वारा इस्तेमाल की गई चीनी PL-15 एयर-टू-एयर मिसाइलों के खिलाफ प्रभावी क्षमता दिखाई थी। इसे वायुसेना की परिचालन बढ़त के रूप में देखा जा रहा है।

फ्रांसीसी पक्ष भारत में राफेल के M-88 इंजनों के लिए मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधा स्थापित करने की भी योजना बना रहा है, जिसका केंद्र हैदराबाद में हो सकता है। डसॉल्ट एविएशन पहले ही फ्रांसीसी मूल के लड़ाकू विमानों के रखरखाव के लिए भारत में एक यूनिट स्थापित कर चुका है। इस योजना में टाटा जैसी भारतीय एयरोस्पेस कंपनियों की भागीदारी भी संभावित है।

क्षेत्रीय सुरक्षा और भविष्य की रणनीति

भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए बड़ी संख्या में लड़ाकू विमानों की तत्काल जरूरत है। भविष्य में IAF का फाइटर फ्लीट मुख्य रूप से Su-30MKI, राफेल और स्वदेशी लड़ाकू विमानों पर आधारित रहने की योजना है। भारत पहले ही 180 LCA तेजस मार्क-1A विमानों का ऑर्डर दे चुका है और 2035 के बाद स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स को बड़ी संख्या में शामिल करने की योजना है।

गौरतलब है कि भारत का फ्रांस के साथ सौदा, अमेरिका और रूस दोनों के अपनी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान—अमेरिकी F-35 और रूसी Su-57 भारतीय वायुसेना को पेश करने के बावजूद आया है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत का राफेल पर फोकस इसके परिचालन अनुभव, त्वरित उपलब्धता और मौजूदा बेड़े के साथ बेहतर एकीकरण के कारण आया है।

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