भारत सरकार रेयर अर्थ मैग्नेट (दुर्लभ धातु चुंबक) उद्योग में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार अपने प्रोत्साहन कार्यक्रम (Incentive Scheme) को लगभग तीन गुना बढ़ाकर ₹7,000 करोड़ (लगभग $788 मिलियन) करने की योजना बना रही है। यह कदम इलेक्ट्रिक वाहनों, रिन्यूएबल एनर्जी और रक्षा क्षेत्र में उपयोग होने वाले आवश्यक खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
यह प्रस्ताव वर्तमान में मंत्रिमंडल की मंजूरी का इंतजार कर रहा है, और अंतिम फंडिंग आवंटन में कुछ संशोधन संभव है। पहले की ₹2,400 करोड़ ($290 मिलियन) योजना की तुलना में यह नया कार्यक्रम भारत की इस रणनीतिक उद्योग में क्षमता को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाने वाला साबित होगा।
आज के दौर में कई देश रेयर अर्थ सप्लाई चेन में चीन की एकाधिकार स्थिति को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। वर्तमान में चीन दुनिया के करीब 90% रेयर अर्थ उत्पादन को प्रोसेस करता है। इस कारण कई वैश्विक वाहन निर्माता और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां सप्लाई संकट का सामना कर रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष की शुरुआत में चेतावनी दी थी कि “महत्वपूर्ण खनिजों को हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।” इसी दिशा में भारत की यह योजना सप्लाई चेन को स्थिर और विविध बनाने की वैश्विक रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के सामने तकनीकी विशेषज्ञता की कमी, लंबी परियोजना अवधि और उच्च प्रारंभिक लागत जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार इस योजना के तहत लगभग पांच कंपनियों को प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) और कैपिटल सब्सिडी के माध्यम से समर्थन देगी। उद्देश्य यह है कि घरेलू और विदेशी निवेशकों को इस क्षेत्र में आकर्षित किया जा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में रेयर अर्थ उत्पादन बिना सरकारी सहायता के आर्थिक रूप से संभव नहीं है। सरकारी कंपनियां विदेशी खदानों के साथ साझेदारी कर कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन तकनीक और रिफाइनिंग क्षमता के मामले में भारत अभी भी चीन से काफी पीछे है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने हाल ही में भारत को रेयर अर्थ मैग्नेट के आयात के लिए पहली बार लाइसेंस जारी कर चूका हैं, हालांकि अभी तक किसी भारतीय मूल की कंपनी को यह अनुमति नहीं मिली है। भारी उद्योग मंत्रालय ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
भारत में वर्तमान में रेयर अर्थ ऑक्साइड्स की वार्षिक मांग लगभग 2,000 टन है, जिसे मौजूदा वैश्विक उत्पादन आसानी से पूरा कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के इस विस्तारित प्रोत्साहन पैकेज से अंतरराष्ट्रीय मैग्नेट निर्माता कंपनियां भारत में निवेश या संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) स्थापित करने की दिशा में आकर्षित होंगी।
यह कदम चीन से होने वाले आयात पर निर्भरता को कम करेगा, जिन पर अक्सर अस्पष्ट सब्सिडी और आक्रामक मूल्य निर्धारण के आरोप लगते है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि चीन अमेरिका और यूरोपीय संघ के लिए हाल में किए गए निर्यात नियंत्रण में दिखाई ढील भारत पर के लिए भी देता है, तो स्थानीय उत्पादन की दिशा में निवेश की गति धीमी पड़ सकती है।
रेयर अर्थ मैग्नेट उद्योग भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा निर्माण जैसे क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैश्विक मांग में तेजी से बढ़ोतरी को देखते हुए, भारत की ₹7,000 करोड़ की यह योजना महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने और चीन पर निर्भरता घटाने की दिशा में एक रणनीतिक बदलाव मानी जा रही है। यदि यह योजना सफल होती है, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक रेयर अर्थ मार्केट में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन सकता है।
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