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लिपुलेख दर्रे से कैलाश यात्रा पर नेपाल की आपत्ति खारिज, भारत ने कहा—दावे तथ्यों पर आधारित नहीं

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भारत ने लिपुलेख दर्रे के जरिए होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल की आपत्ति को खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है कि इस क्षेत्र को लेकर नेपाल के दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों व साक्ष्यों पर आधारित हैं।

रविवार(3 मई) को नेपाल सरकार ने भारत और चीन को राजनयिक नोट भेजकर उत्तराखंड स्थित लिपुलेख दर्रे से होकर होने वाली यात्रा पर आपत्ति जताई थी। नेपाल का दावा है कि यह क्षेत्र उसकी संप्रभुता के अंतर्गत आता है। नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर पौडेल क्षेत्री ने बताया कि काठमांडू ने अपने दोनों पड़ोसी देशों के सामने अपनी चिंता आधिकारिक रूप से रखी है।

भारत की ओर से प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि इस मुद्दे पर भारत का रुख पहले से ही स्पष्ट और सुसंगत रहा है। उन्होंने कहा, “जहां तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऐसे दावे न तो न्यायसंगत हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। इस तरह एकतरफा और कृत्रिम रूप से क्षेत्रीय दावों का विस्तार स्वीकार्य नहीं है।”

जायसवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है और यह कोई नई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर नेपाल के साथ रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है, जिसमें लंबित सीमा विवादों का समाधान भी संवाद और कूटनीति के जरिए किया जा सकता है।

गौरतलब है कि तिब्बत क्षेत्र में स्थित पवित्र पर्वत और झील तक जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा 2025 में पांच साल के अंतराल के बाद फिर से शुरू हुई थी। यह पुनःआरंभ भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय तक चले गतिरोध के बाद संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में उठाए गए कदमों का हिस्सा था। इस वर्ष यात्रा जून से अगस्त के बीच आयोजित की जाएगी। योजना के अनुसार, उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से 50-50 यात्रियों के 10 दल जाएंगे, जबकि सिक्किम के नाथू ला मार्ग से भी इतने ही दल यात्रा करेंगे।

नेपाल ने अपने दावे के समर्थन में 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए कहा है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र उसके अभिन्न हिस्से हैं। नेपाल ने भारत से इन इलाकों में सड़क निर्माण, सीमा व्यापार और तीर्थ यात्राओं जैसी गतिविधियों से परहेज करने का आग्रह किया है। हालांकि, भारत ने एक बार फिर दोहराया है कि वह इस तरह के दावों को स्वीकार नहीं करता, लेकिन दोनों देशों के बीच शेष मुद्दों के समाधान के लिए संवाद का रास्ता खुला हुआ है।

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