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भारतीय वाणिज्य दूतावास के बाहर; PM मोदी को निशाना बनाकर ISIS-स्टाइल क़त्ल की धमकी

ऑरेंज जंपसूट, नकाबपोश लोग और ‘फर्जी गिरफ्तारी’ दृश्य पर भड़का गुस्सा

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ब्रिटेन के बर्मिंघम स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के बाहर फिल्माए गए एक बेहद आपत्तिजनक वीडियो ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है। वायरल हो रहे इस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मास्क पहने एक व्यक्ति को ISIS शैली के कथित एक्जीक्यूशन दृश्य में दिखाया गया है, जिसके बाद इस पर व्यापक आक्रोश देखने को मिल रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक यह वीडियो बर्मिंघम स्थित रामगी हाउस के बाहर शूट किया गया, जहां भारत के महावाणिज्य दूतावास बर्मिंघम का कार्यालय मौजूद है। वीडियो में एक व्यक्ति प्रधानमंत्री मोदी का मास्क और चमकीले नारंगी रंग का जंपसूट पहने दिखाई देता है। उसे तीन नकाबपोश लोग घुटनों पर बैठने के लिए मजबूर करते नजर आते हैं। ये लोग काले कपड़ों, बैलाक्लावा मास्क और टैक्टिकल स्टाइल ड्रेस में दिखाई दे रहे हैं।

वीडियो में  “कश्मीर आज़ाद होगा!” और “मोदी की विदेश नीति: मेड इन तेल अवीव” जैसे भड़काऊ स्लोगन वाले पोस्टर भी दिखाए गए हैं। पूरे वीडियो को “Live Breaking News” स्टाइल में तैयार किया गया है।

वीडियो में खुद को “Deenified” नामक समूह बताने वाले लोगों का एक प्रवक्ता कैमरे के सामने दावा करता है कि उन्होंने “नरेंद्र मोदी को गिरफ्तार कर लिया है” और भारतीय प्रधानमंत्री को “नरसंहारी” कहता है। वीडियो में समर्थकों से  आंदोलन में शामिल होने की अपील भी की जाती है। प्रवक्ता कहता है,  “एक दिन मोदी हमारे हाथों में इसी तरह हथकड़ियों में होगा।”

हालांकि सबसे ज्यादा विवाद इस वीडियो की प्रस्तुति शैली को लेकर हुआ है। वीडियो का दृश्य और प्रतीकात्मक स्वरूप कुख्यात ISIS बंधक हत्या वीडियो से मिलता-जुलता बताया जा रहा है। ऑरेंज जंपसूट, घुटनों पर बैठा व्यक्ति और काले कपड़ों में नकाबपोश लोग सीधे तौर पर उन वीडियो की याद दिलाते हैं जिनमें ISIS आतंकी मोहम्मद एमवाज़ी, जिसे ‘जिहादी जॉन’ के नाम से जाना जाता था, पश्चिमी बंधकों के साथ दिखाई देता था।

सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है। कई लोगों ने इसे न केवल भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ उकसावे वाला कृत्य बताया बल्कि भारतीय राजनयिक मिशन के बाहर इस तरह की गतिविधि को सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिहाज से गंभीर मामला माना है।

विवाद के बीच कई यूजर्स और संगठनों ने ब्रिटिश प्रशासन से मामले की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। वहीं भारतीय समुदाय के कुछ प्रतिनिधियों ने इसे कट्टरपंथी प्रचार का हिस्सा बताते हुए कड़ी निंदा की है।

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