इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय देते हुए कहा है कि गर्भ में 5 महीने से अधिक समय तक पल रहा अजन्मा भ्रूण कानून की नजर में एक ‘व्यक्ति’ माना जाएगा। ऐसे में यदि किसी दुर्घटना में उसकी मृत्यु होती है, तो उसके लिए परिवार को अलग से मुआवजा दिया जाना चाहिए।
यह फैसला एक रेलवे दुर्घटना से जुड़े मामले में सुनाया गया, जिसमें एक गर्भवती महिला और उसके अजन्मे बच्चे दोनों की मौत हो गई थी। इससे पहले रेलवे दावा अधिकरण ने केवल महिला की मृत्यु के लिए मुआवजा दिया था और भ्रूण को अलग व्यक्ती मानने से इनकार कर दिया था।
लखनऊ बेंच ने इस फैसले को पलटते हुए स्पष्ट किया कि विकास के एक निश्चित चरण के बाद भ्रूण को स्वतंत्र जीवन का दर्जा प्राप्त हो जाता है, इसलिए उसकी मृत्यु को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दरअसल मामला 2 सितंबर 2018 की घटना से जुड़ा है, जब 8-9 महीने की गर्भवती भानमती ट्रेन पर चढ़ते समय गिर गई थीं। इस हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गईं और बाद में इलाज के दौरान महिला और उसके अजन्मे बच्चे दोनों की मौत हो गई।
इससे पहले अधिकरण ने अप्रिय रेलवे घटनाओं से जुड़े प्रावधानों के तहत महिला की मृत्यु के लिए 8 लाख रुपये का मुआवजा दिया था, लेकिन अजन्मे बच्चे के लिए अलग से मुआवजा देने से इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ पीड़ित परिवार ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने कहा कि यदि गर्भस्थ शिशु 5 महीने से अधिक का है, तो उसे कानूनी रूप से एक व्यक्ति माना जाएगा। इसलिए दुर्घटना में उसकी मृत्यु को भी मुआवजे के उद्देश्य से एक बच्चे की मृत्यु के समान माना जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे अधिनियम के तहत अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे दुर्घटनाओं में हुई हर प्रकार की जनहानि पर मुआवजा दें, जिसमें अजन्मे बच्चे की मृत्यु भी शामिल है।
अदालत ने अंततः रेलवे दावा अधिकरण को निर्देश दिया कि वह भ्रूण की मृत्यु के लिए भी परिवार को अलग से मुआवजा प्रदान करे। इस फैसले को कानूनी दृष्टि से एक अहम मिसाल माना जा रहा है, जो भविष्य के मामलों में मार्गदर्शक बन सकता है।
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