उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार से पूछा है कि क्या 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि के तहत नेपाल के नागरिकों को भारत में बिना किसी रोक-टोक के बसने और संपत्ति खरीदने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या भारतीय नागरिकों को नेपाल में भी समान अधिकार वास्तव में दिए जाते हैं।
यह मामला नैनीताल निवासी पवन जाटव द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नेपाल के लगभग 25 परिवारों ने भारतीय नागरिकता प्राप्त किए बिना नैनीताल शहर और खुरपाताल ग्राम सभा क्षेत्र में सरकारी और नजूल भूमि पर वर्षों से कब्जा कर रखा है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब मांगा।
याचिका में दावा किया गया है कि इन नेपाली परिवारों ने प्रशासनिक खामियों का लाभ उठाकर ड्राइविंग लाइसेंस, स्थायी निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज हासिल कर लिए। इतना ही नहीं, आरोप है कि उनके नाम मतदाता सूची में भी शामिल कर लिए गए और उन्हें वोटर आईडी कार्ड जारी कर दिए गए। याचिकाकर्ता के अनुसार, ये लोग पानी-बिजली कनेक्शन और सरकारी योजनाओं का लाभ भी ले रहे हैं।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि के अनुच्छेद 7 का हवाला दिया। इस अनुच्छेद में भारत और नेपाल द्वारा एक-दूसरे के नागरिकों को निवास, संपत्ति के स्वामित्व, व्यापार, आवागमन और अन्य सुविधाओं में समान अधिकार देने का प्रावधान है।
हालांकि हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या इस आपसी आधार का वास्तव में पालन हो रहा है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि नेपाल भारतीय नागरिकों को कौन-कौन से विशेषाधिकार देता है और क्या वे भारत में नेपाली नागरिकों को दिए जा रहे अधिकारों के समान हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “यह नहीं बताया गया है कि नेपाल की ओर से भारतीय नागरिकों को कौन से विशेषाधिकार दिए जा रहे हैं, जो यह तय करने के लिए आवश्यक है कि क्या नेपाल के नागरिक बिना किसी औपचारिक अनुमति के भारत में बसने के हकदार हैं।”
याचिकाकर्ता पवन जाटव के वकील ने अदालत में दलील दी कि इस संधि की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती कि कोई भी विदेशी नागरिक बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए भारत में अचल संपत्ति खरीद सके। उन्होंने कहा कि नेपाल के नागरिकों सहित किसी भी विदेशी नागरिक को भारत में संपत्ति खरीदने के लिए नियामक ढांचे और जहां आवश्यक हो, भारतीय रिजर्व बैंक की पूर्व अनुमति लेनी चाहिए।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि उत्तराखंड सरकार के हलफनामे में संधि का जिक्र तो किया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन कानूनी प्रावधानों या नीतियों के तहत नेपाली नागरिक भारत में बस रहे हैं और जमीन खरीद रहे हैं।
अदालत ने उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया है कि वह तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल करे और स्पष्ट करे कि किस नीति और कानूनी व्यवस्था के तहत ऐसे निवास, बसाहट और संपत्ति लेन-देन की अनुमति दी जा रही है।
जनहित याचिका में उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की गई है, जिन पर कथित तौर पर इन परिवारों को पहचान पत्र जारी करने का आरोप है। साथ ही कथित अतिक्रमण हटाने की भी मांग की गई है। मामले की अगली सुनवाई जून में होगी।
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