अदालत को निशाना बनाने वाले पत्रकार सौरव दास और केजरीवाल के खिलाफ अवमानना याचिका

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ कथित अभियान चलाने का आरोप, AAP के कई वरिष्ठ नेता भी बनाए गए पक्षकार

अदालत को निशाना बनाने वाले पत्रकार सौरव दास और केजरीवाल के खिलाफ अवमानना याचिका

Contempt petition against journalist Saurav Das and Kejriwal for targeting the court

दिल्ली हाई कोर्ट में आम आदमी पार्टी (AAP) प्रमुख अरविंद केजरीवाल और पत्रकार सौरव दास के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दोनों एक सुनियोजित अभियान का हिस्सा थे, जिसका उद्देश्य दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को निशाना बनाना और न्यायपालिका की गरिमा को कमजोर करना था।

इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच करेगी, जिसमें जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा शामिल हैं। याचिका में केवल अरविंद केजरीवाल और सौरव दास ही नहीं, बल्कि AAP के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज और गोपाल राय को भी प्रतिवादी बनाया गया है।

यह याचिका अधिवक्ता अशोक चैतन्य के माध्यम से दाखिल की गई है। आपराधिक अवमानना मामलों में आवश्यक प्रक्रिया के तहत दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील (क्रिमिनल) संजीव भंडारी से सहमति प्राप्त करने के बाद याचिका अदालत में प्रस्तुत की गई।

इस मामले के सामने आने के बाद पत्रकार सौरव दास की भूमिका और उनके सार्वजनिक लेखन पर भी नई बहस शुरू हो गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सौरव दास लंबे समय से न्यायपालिका और न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ वैचारिक दृष्टिकोण से प्रेरित लेखन और सोशल मीडिया अभियान चलाते रहे हैं, खासकर उन मामलों में जहां अदालतों की टिप्पणियां या फैसले उनके राजनीतिक या वैचारिक रुख से मेल नहीं खाते।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि सौरव दास ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी जैसे वरिष्ठ न्यायाधीशों पर भी तीखे लेख लिखे। आरोप है कि उनके लेखों में न्यायपालिका की निष्पक्षता और संस्थागत निर्णयों पर सवाल खड़े करने की कोशिश की गई, जिससे न्यायिक संस्थाओं के प्रति सार्वजनिक धारणा को प्रभावित किया जा सके।

मामले में यह भी कहा गया कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में अदालतों के फैसलों के बाद संबंधित न्यायाधीशों को निशाना बनाकर आक्रामक टिप्पणियां की जाती रहीं। इससे यह चिंता उभरी कि कानूनी बहस के बजाय वैचारिक दृष्टिकोण के जरिए न्यायपालिका की छवि को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है।

अब यह पूरा विवाद दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष पहुंच चुका है, जहां अदालत यह तय करेगी कि संबंधित बयान, लेखन और सार्वजनिक टिप्पणियां न्यायपालिका की अवमानना की श्रेणी में आती हैं या नहीं।

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