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Sunday, October 18, 2026
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सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ी, राष्ट्रपति ने अध्यादेश को दी मंजूरी

लंबित 92 हजार से अधिक मामलों के बीच केंद्र सरकार का बड़ा फैसला, अब CJI समेत कुल 38 जज होंगे

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 को मंजूरी दे दी है। इस अध्यादेश के तहत देश की सर्वोच्च अदालत में जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को मिलाकर अब सुप्रीम कोर्ट की कुल क्षमता 38 जजों की हो गई है।

दौरान सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, सर्वोच्च अदालत में इस समय 92 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को कम करने और मामलों के तेजी से निपटारे के लिए यह कदम जरूरी हो गया था।

इस महीने की शुरुआत में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इससे जुड़े संशोधन विधेयक को मंजूरी दी थी। उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किया गया। मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में यह दूसरी बार है जब सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाई गई है। इससे पहले वर्ष 2019 में जजों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की गई थी।

संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत संसद को यह अधिकार है कि वह मुख्य न्यायाधीश के अलावा सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों की संख्या निर्धारित कर सके। इसी संवैधानिक प्रावधान के तहत यह विस्तार किया गया है।

केंद्र सरकार ने इस फैसले को न्यायिक दक्षता बढ़ाने की दिशा में अहम कदम बताया है। सरकार का तर्क है कि नए मामलों की लगातार बढ़ती संख्या और पहले से लंबित मामलों ने मौजूदा जजों पर अत्यधिक दबाव बना दिया है। जजों की संख्या बढ़ने से अब सुप्रीम कोर्ट में एक साथ अधिक बेंच गठित की जा सकेंगी।

सुप्रीम कोर्ट में अधिकांश मामलों की सुनवाई दो या तीन जजों की बेंच करती है। ऐसे में अतिरिक्त जजों की नियुक्ति से मामलों की सुनवाई की क्षमता बढ़ेगी और फैसलों में तेजी आने की उम्मीद है। इसके साथ ही जजों पर व्यक्तिगत कार्यभार भी कम होगा, जिससे सुनवाई के लिए अधिक समय मिल सकेगा और बार-बार स्थगन की स्थिति में कमी आ सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से तत्काल स्तर पर कुछ राहत जरूर मिल सकती है। अदालतों में सुनवाई के लिए लंबा इंतजार कम हो सकता है और संवैधानिक मामलों के साथ-साथ नियमित मामलों की सुनवाई भी अधिक व्यवस्थित तरीके से हो सकेगी।

बता दें की, सर्वोच्च न्यायालय में हर महीने लगभग 5,000 से 7,500 नए मामले दर्ज किए जाते हैं और अदालत अपनी कार्यकुशलता के आधार पर प्रतिमाह लगभग 5,000 से 7,900 मामलों का निपटारा कर देती है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) और सुप्रीम कोर्ट जस्टिस क्लॉक (Justice Clock) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, न्यायालय का केस क्लीयरेंस रेट (CCR) 85% से 115% के बीच रहता है, जिसका मतलब है कि यह कई महीनों में दर्ज होने वाले मामलों से भी अधिक का निपटारा करता है। इसके बावजूद, छुट्टियों (जैसे गर्मी और सर्दियों के अवकाश) के दौरान काम रुकने और बढ़ती मुकदमेबाजी के कारण अदालत में वर्तमान में 93,000 से अधिक मामले लंबित (Pending) हैं, जिसे संभालने के लिए हाल ही में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाकर 38 करने को मंजूरी दी गई है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि देश के कुल 5.4 करोड़ से अधिक लंबित मामलों का 85% से ज्यादा हिस्सा जिला और निचली अदालतों में है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय इस व्यवस्था में सबसे तेजी से काम करने वाली संस्था है।

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