सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (10 फरवरी) को आसाम सरकार को 3,62,082 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की योजना पर आगे बढ़ने की अनुमति दे दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा अपनाई जाने गई प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं और यह निष्पक्षता, तर्कसंगतता तथा विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुरूप है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा, “हमारी राय में, आरक्षित वनों से अतिक्रमण हटाने के दौरान राज्य सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली कार्यप्रणाली में पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय शामिल हैं। अतिक्रमण हटाने के लिए राज्य सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया निष्पक्षता, तर्कसंगतता और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के सिद्धांतों के अनुरूप है।”
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भरोसा दिलाया है कि राज्य द्वारा विकसित तंत्र का पाल वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता के साथ किया जाएगा। पीठ ने कहा, “सॉलिसिटर जनरल ने हमें आश्वासन दिया है कि राज्य द्वारा विकसित तंत्र का पालन आरक्षित वनों में अनधिकृत कब्जे को हटाने की कार्रवाई के दौरान वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष तरीके से किया जाएगा।”
यह फैसला डोयांग, साउथ नमबर, जमुना मदुंगा, गोलाघाट और अन्य आरक्षित वनों में स्थित गांवों के निवासियों द्वारा दायर याचिकाओं और अपीलों पर आया। राज्य वन विभाग ने याचिकाकर्ताओं को यह कहते हुए बेदखली नोटिस जारी किए थे कि वे आरक्षित वन भूमि पर अनधिकृत रूप से काबिज हैं। वहीं याचिकाकर्ता अब्दुल खालिक और अन्य का दावा था कि वे और उनके पूर्वज पिछले 70 वर्षों से अधिक समय से इन गांवों में रह रहे हैं और उनके पास राशन कार्ड, आधार तथा अन्य पहचान पत्र हैं, जो राज्य एजेंसियों द्वारा जारी किए गए हैं।
असम सरकार ने अदालत को बताया कि राज्य के वन क्षेत्र का लगभग 19.92% हिस्सा अतिक्रमण के अधीन है। सरकार ने कहा कि आरक्षित वनों से सभी अनाधिकृत अतिक्रमणों को हटाने और वनीकरण एवं संरक्षण उपायों के माध्यम से भूमि को पुनर्स्थापित करने का नीतिगत निर्णय लिया गया है। राज्य ने एक हलफनामा भी दाखिल किया जिसमें कहा गया कि प्रत्येक मामले की जांच के लिए वन एवं राजस्व अधिकारियों की एक समिति गठित की जाएगी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने एक हलफनामा दाखिल कर बताया कि वह वन और राजस्व अधिकारियों की एक समिति गठित करेगी, जो कब्जाधारियों को यह अवसर देगी कि वे अपने पास मौजूद भूमि पर अधिकार से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत कर सकें। सरकार ने कहा कि कार्रवाई केवल तभी की जाएगी जब यह पाया जाएगा कि संबंधित भूमि वास्तव में आरक्षित वन क्षेत्र में अतिक्रमण के दायरे में आती है।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में वनों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “वन भूमि पर अतिक्रमण देश में पर्यावरणीय शासन के सामने खड़ी सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बनकर उभरा है।”
अदालत ने आगे कहा, “संविधान राज्य पर वनों और पर्यावरण की रक्षा का स्पष्ट और निर्विवाद दायित्व डालता है… संविधान का अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक पर प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें वन भी शामिल हैं, उसकी रक्षा और सुधार का मूल कर्तव्य बताता है। यह संवैधानिक प्रावधान नागरिकों और राज्य, दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी को दर्शाते हैं कि वे पर्यावरणीय क्षति को रोकें, विनियमित करें और उसका उपचार करें।”
हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण की कार्रवाई कानून के दायरे में रहकर ही होनी चाहिए। फैसले में कहा गया, “साथ ही, संवैधानिक शासन यह मांग करता है कि पर्यावरण संरक्षण वैध साधनों के माध्यम से किया जाए। वन भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश मनमानी कार्रवाई की अनुमति नहीं देता। संविधान पर्यावरण संरक्षण और विधि के शासन के बीच किसी एक को चुनने की कल्पना नहीं करता; बल्कि यह अपेक्षा करता है कि दोनों साथ-साथ अस्तित्व में रहें और एक-दूसरे को सुदृढ़ करें।”
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