सर्वोच्च न्यायालय में बुधवार (27 मई) को चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना अहम फैसला सुनाने जा रहा है। इस मामले को देश की चुनावी व्यवस्था और मतदाता अधिकारों से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक विवाद माना जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ इस मामले में फैसला सुनाएगी। अदालत ने इस वर्ष की शुरुआत में लंबी सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
याचिकाओं में भारत निर्वाचन आयोग की मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का विरोध किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों के दायरे से बाहर जाकर लागू की गई है।
पूरा विवाद मुख्य रूप से चुनाव आयोग की उस शर्त को लेकर है जिसके तहत जिन मतदाताओं के नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची या कुछ राज्यों में 2003 की सूची में मौजूद नहीं हैं, उन्हें अपने परिवार या पूर्वजों का संबंध ऐसे व्यक्ति से साबित करना होगा जिसका नाम पुरानी मतदाता सूची में दर्ज था।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि यह शर्त लाखों वास्तविक मतदाताओं को मतदान अधिकार से वंचित कर सकती है, खासकर प्रवासी मजदूरों, गरीब तबकों, सीमांत समुदायों और उन लोगों को जिनके पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कई अंतरिम निर्देश भी जारी किए थे ताकि SIR प्रक्रिया से प्रभावित मतदाताओं को राहत मिल सके और पारदर्शिता बनी रहे। चुनाव आयोग ने शुरुआत में पहचान सत्यापन के लिए 11 दस्तावेज तय किए थे, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को भी अतिरिक्त दस्तावेज के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया।
इस मामले में अधिकांश याचिकाएं पिछले वर्ष जून में दायर की गई थीं, जब चुनाव आयोग ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान शुरू किया था। बाद में इस प्रक्रिया को पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु समेत कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित कर दिया गया।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और सटीक बनाना है ताकि फर्जी, डुप्लीकेट या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें। आयोग का तर्क था कि स्वच्छ मतदाता सूची निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है की पहचान और नागरिकता से जुड़े अतिरिक्त प्रमाण मांगना चुनाव आयोग की संवैधानिक सीमाओं से बाहर है और इससे लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
29 जनवरी को सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब बुधवार को आने वाला निर्णय न केवल बिहार बल्कि उन सभी राज्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया लागू की गई है।
इस फैसले पर राजनीतिक दलों, चुनाव विशेषज्ञों और नागरिक अधिकार संगठनों की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि अदालत का निर्णय भविष्य में मतदाता सत्यापन और चुनावी प्रक्रियाओं के स्वरूप को भी प्रभावित कर सकता है।
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