आसाम की भाजपा सरकार ने अपने एक और बड़े और अहम चुनावी वादे को पूरा करते हुए राज्य विधानसभा में ‘आसाम समान नागरिक संहिता विधेयक 2026’ (Assam Uniform Civil Code Bill 2026) पेश कर दिया है। इस कानून के लागू होने के बाद राज्य में धर्म और मजहब के आधार पर चलने वाले सभी पर्सनल लॉ पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे और उनकी जगह सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे और लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक समान कानूनी ढांचा लागू होगा।
राज्य सरकार के अनुसार, इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles) के तहत समान नागरिक संहिता को लागू करना और समाज में लैंगिक समानता (Gender Equality) व तटस्थता को बढ़ावा देना है।
अनुसूचित जनजातियों (ST) को कानून से छूट
प्रस्तावित आसाम UCC कानून राज्य के सभी निवासियों पर लागू होगा, जिसमें राज्य से बाहर रहने वाले असमी नागरिक भी शामिल हैं। हालांकि, भारतीय संविधान के प्रावधानों का सम्मान करते हुए आसाम की मूल अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) को इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है। विधेयक के मसौदे के अनुसार, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (25) और अनुच्छेद 342 के तहत आने वाले किसी भी अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर इस संहिता का कोई भी नियम लागू नहीं होगा।
विवाह और तलाक से जुड़े बड़े बदलाव: बहुविवाह पर पूर्ण रोक
आसाम UCC बिल 2026 में ‘विवाह और तलाक’ खंड के तहत बेहद कड़े और सुधारात्मक नियम तय किए गए हैं। विवाह के लिए पुरुष की कानूनी उम्र 21 वर्ष और महिला की 18 वर्ष से अधिक होना अनिवार्य है। कानूनन केवल एक ही विवाह की अनुमति होगी। यानी विवाह के समय दोनों में से किसी भी पक्ष का पहले से कोई जीवित जीवनसाथी (पति या पत्नी) नहीं होना चाहिए।
आसाम मुस्लिमों, देश भर के कुछ इस्लामी संगठन और उनके राजनीतिक सहयोगियों द्वारा इस कानून का पुरजोर विरोध किया जा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह कानून मुस्लिमों को उनके अरबी संस्कृति के ग्रंथों के आधार पर एक साथ चार पत्नियां रखने के अधिकार (बहुविवाह) को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है। UCC लागू होने के बाद मुस्लिम समुदाय से यह विशेष अधिकार छिन जाएगा, जिसे सरकार जनसांख्यिकीय संतुलन और महिला अधिकारों के लिए जरूरी मान रही है।
UCC लागू होने से पहले हो चुकी बहुविवाहित शादियों को विशेष नियमों के तहत पंजीकृत तो किया जा सकेगा, लेकिन कानून लागू होने के बाद किसी को भी दोबारा दूसरा विवाह करने की अनुमति नहीं होगी।
UCC किसी भी धर्म की विवाह पद्धतियों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। नागरिक अपने-अपने धार्मिक और पारंपरिक तौर-तरीकों जैसे कि सप्तपदी (हिंदू वैदिक विवाह), निकाह (मुस्लिम विवाह), आनंद कारज (सिख विवाह), अहोम चाकलॉन्ग विवाह या होली यूनियन आदि के जरिए शादी कर सकते हैं।
विवाह का अनिवार्य पंजीकरण
आसाम UCC बिल का सबसे बड़ा प्रशासनिक सुधार विवाह का अनिवार्य पंजीकरण है। नए नियमों के तहत राज्य में होने वाली सभी नई शादियों का 60 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। यदि विवाह असम से बाहर हुआ है, तो 90 दिनों की मोहलत मिलेगी। 25 अक्टूबर 2024 से लेकर इस कानून के लागू होने की तारीख के बीच हुई सभी शादियों को भी 6 महीने के भीतर पंजीकृत कराना होगा।
वर्ष 2024 के असम अधिनियम के तहत पहले से पंजीकृत मुस्लिम विवाहों को यूसीसी लागू होने के बाद स्वचालित रूप से (Automatically) पंजीकृत मान लिया जाएगा।
विवाह का पंजीकरण न कराने, झूठे बयान देने या जालसाजी करने पर ₹10,000 से लेकर ₹25,000 तक का जुर्माना और/या 3 महीने तक की जेल की सजा का प्रावधान है। हालांकि, पंजीकरण न होने से शादी अवैध नहीं होगी, लेकिन कानूनी कार्रवाई जरूर होगी। सरकारी और निजी नियोक्ताओं को निर्देश दिया गया है कि वे रिकॉर्ड में वैवाहिक स्थिति बदलने से पहले सब-रजिस्ट्रार द्वारा जारी विवाह प्रमाण पत्र की जांच करें।
खत्म हुए धार्मिक कानून:
उत्तराधिकार और विरासत (Succession or Inheritance) के मामले में असम यूसीसी ने हिंदू, मुस्लिम और ईसाई पर्सनल लॉ को एक साझा कानून से बदल दिया है।
यदि कोई व्यक्ति अपनी वसीयत (Will) बनाए बिना मर जाता है, तो धारा 55 के बाद के नियमों के अनुसार उसकी संपत्ति का बंटवारा धार्मिक प्राथमिकताओं के बजाय ‘क्लास-1’ (Class-1) के उत्तराधिकारियों में समान रूप से होगा। क्लास-1 में मृतक की पत्नी/पति, बच्चे और पहले मर चुके बच्चों के जीवित बच्चे शामिल होंगे। यदि क्लास-1 का कोई वारिस नहीं है, तब संपत्ति क्रमशः क्लास-2, क्लास-3 के रिश्तेदारों और अंत में किसी भी करीबी रिश्तेदार के न होने पर पूरी संपत्ति ‘राजगामी’ (Escheat) सिद्धांत के तहत सरकारी स्वामित्व में चली जाएगी।
इस कानून में संपत्ति के अधिकारों को पूरी तरह से लैंगिक रूप से तटस्थ बनाया गया है। बिना वसीयत के मरने वाले व्यक्ति की संपत्ति में बेटा-बेटी, वैध-अवैध बच्चे, गोद लिए गए बच्चे या सरोगेसी से पैदा हुए बच्चों को बराबर का कानूनी अधिकार मिलेगा।
यदि किसी व्यक्ति ने संपत्ति के लालच में मूल मालिक की हत्या की है या उसकी हत्या की साजिश (Abetment) रची है, तो वह विरासत के अधिकार से पूरी तरह अयोग्य हो जाएगा। इसके अलावा, विशिष्ट मामलों में यदि कोई विधवा या विधुर मूल व्यक्ति के जीवनकाल में ही पुनर्विवाह कर लेता है, तो वह संपत्ति का अधिकार खो देगा। हालांकि, किसी बीमारी, शारीरिक दोष या विकृति के आधार पर किसी को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
अब कोई भी नागरिक बिना किसी धार्मिक बंदिश या सीमा के अपनी पूरी संपत्ति की वसीयत किसी के भी नाम कर सकता है। हालांकि, कुछ करीबी रिश्तेदार जो भरण-पोषण के हकदार हैं, उन्हें पूरी तरह से बेदखल नहीं किया जा सकेगा।
लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता: लेकीन पंजीकरण भी जरूरी
आसाम UCC बिल 2026 में एक और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) को कानूनी मान्यता दी गई है, लेकिन इसके साथ ही कुछ बेहद कड़े नियम भी जोड़े गए हैं।
लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को सब-रजिस्ट्रार के पास एक संयुक्त “लिव-इन रिलेशनशिप का विवरण” (statement of live-in relationship) जमा करना होगा। रजिस्ट्रार की संक्षिप्त जांच के बाद ही इसे पंजीकृत किया जाएगा। पंजीकृत लिव-इन पार्टनर को भरण-पोषण का अधिकार, साझा घर का अधिकार और इस रिश्ते से पैदा होने वाले बच्चों को पूर्ण कानूनी अधिकार प्राप्त होंगे। यदि दोनों पार्टनर अलग होना चाहते हैं, तो उन्हें रजिस्ट्रार के समक्ष रिश्ता समाप्ति का विवरण दाखिल करना होगा। लिव-इन रिलेशनशिप को पंजीकृत न कराने या गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
आसाम समान नागरिक संहिता 2026 धार्मिक असमानताओं को दूर कर विवाह, तलाक और संपत्ति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सभी नागरिकों को एक पायदान पर लाती है। यह कानून अनुष्ठानों और आस्था की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए कानूनी अधिकारों और सामाजिक दायित्वों में पूर्ण एकरूपता सुनिश्चित करता है, जिससे असम के सभी नागरिक (अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर) कानून के समक्ष वास्तव में समान हो जाएंगे।
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