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‘न्यायिक सक्रियता को न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलना चाहिए’: प्रधान न्यायाधीश

ऑक्सफोर्ड यूनियन में दिया संदेश।

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भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी. आर. गवई ने बुधवार (11 जून) को न्यायपालिका की सीमाओं और जिम्मेदारियों को लेकर एक स्पष्ट और तीखा संदेश दिया। ऑक्सफोर्ड यूनियन में एक प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान उन्होंने कहा, “न्यायिक सक्रियता को न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलना चाहिए।” उनका यह बयान न्यायिक सीमाओं और विधायी संतुलन की बहस को नई दिशा दे रहा है।

सीजेआई गवई ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में न्यायिक सक्रियता का एक अहम स्थान है, लेकिन इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि न्यायपालिका अपनी सीमा में रहे। “कभी-कभी ऐसा होता है जब न्यायपालिका उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने लगती है, जो सामान्यतः उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते,” उन्होंने कहा।

हालांकि सीजेआई ने यह भी जोड़ा कि जब कार्यपालिका या विधायिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहती है, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग केवल विशेष परिस्थितियों में और बहुत सीमित रूप में ही होना चाहिए। “जब कोई कानून संविधान की मूल संरचना से टकराता हो या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो, तब अदालत हस्तक्षेप कर सकती है — और ऐसा उसने कई बार किया है,” उन्होंने कहा।

सीजेआई गवई ने भारतीय संविधान को “स्याही में उकेरी गई एक शांत क्रांति” कहा और इसे भारत की लोकतांत्रिक आत्मा का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि संविधान में उन आवाज़ों की धड़कनें शामिल हैं जिन्हें दशकों तक दबाया गया। उन्होंने कहा, “संविधान हमें केवल अधिकारों की सुरक्षा करने को नहीं कहता, बल्कि वह हमें समाज को सुधारने और सशक्त बनाने की दिशा में सक्रिय रूप से आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है।”

सीजेआई गवई ने अपने संबोधन में अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए। उन्होंने कहा कि यह भारत के संविधान की ताकत है कि एक दलित — जिसे कभी ‘अस्पृश्य’ कहा जाता था — आज देश की सर्वोच्च न्यायिक कुर्सी पर बैठकर ऑक्सफोर्ड यूनियन को संबोधित कर रहा है।

इस ऐतिहासिक भाषण के माध्यम से सीजेआई ने न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका, न्यायिक सीमाओं और सामाजिक न्याय की दिशा में संविधान की ताकत को वैश्विक मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। न्यायिक संतुलन को लेकर दिया गया उनका संदेश, भारत के लोकतंत्र में शक्ति के संतुलन की चर्चा को एक बार फिर से केंद्र में ले आया है।

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