महाभियोग से पहले जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा; सुरक्षित किए रिटायरमेंट लाभ

नकदी कांड के एक साल बाद पद छोड़ा

महाभियोग से पहले जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिया इस्तीफा; सुरक्षित किए रिटायरमेंट लाभ

Justice Yashwant Verma resigns ahead of impeachment; secures retirement benefits

आख़िरकार जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपा। यह फैसला उनके आधिकारिक आवास से भारी मात्रा में नकदी मिलने के करीब एक साल बाद आया है। जस्टिस वर्मा का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब उनके खिलाफ न्यायपालिका की आंतरिक जांच चल रही थी और संसद में महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी।

दरअसल मामला 14 मार्च 2025 को सामने आया था, जब नई दिल्ली के तुगलक क्रेसेंट स्थित उनके सरकारी बंगले में आग लग गई थी। उस दौरान मौके पर पहुंचे दमकल कर्मियों और पुलिस ने वहां ₹500 के नोटों के बंडल देखे, जिनमें से कुछ जल रहे थे और कुछ आंशिक रूप से जले हुए थे। बाद में अधिकारियों ने पुष्टि की कि यह नकदी उस कमरे में पाई गई थी, जो जस्टिस वर्मा के नियंत्रण में था।

घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक इन-हाउस जांच समिति गठित की थी। इस समिति ने निष्कर्ष निकाला कि नकदी वास्तव में बरामद हुई थी और उस कमरे पर जस्टिस वर्मा का प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण था। इसके बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया। उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को वहां पदभार संभाला, लेकिन उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया।

जस्टिस वर्मा ने शुरुआत में इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश ने उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की। अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 140 से अधिक सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था। इसके लिए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन भी किया गया था।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी जस्टिस वर्मा की याचिका को खारिज कर दिया, जिससे संसद में उनके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया था। भारतीय संवैधानिक प्रावधानों के तहत, यदि किसी जज को संसद द्वारा हटाया जाता है, तो उसे पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभ नहीं मिलते। हालांकि, स्वेच्छा से इस्तीफा देने के कारण जस्टिस वर्मा अब अपने सभी रिटायरमेंट लाभ सुरक्षित रखने में सफल रहे हैं।

यह मामला न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर चेहरा उजागर करता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आंतरिक जांच और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का आगे क्या परिणाम निकलता है और क्या इस तरह के मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए कोई ठोस सुधार किए जाते हैं।

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