भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाते हुए विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर आगामी 13 जुलाई से तीन दिवसीय दौरे पर चीन जाएंगे। वह बीजिंग और तिआनजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे। इस वर्ष एससीओ की अध्यक्षता चीन के पास है, और यह दौरा गलवान घाटी की 2020 की हिंसक झड़प के बाद जयशंकर की पहली चीन यात्रा होगी।
यह यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय राजनयिक संपर्कों की श्रृंखला चल रही है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अक्टूबर 2023 में ब्रिक्स सम्मेलन (कजान, रूस) के दौरान पांच वर्षों बाद प्रतिनिधिमंडल स्तर की बैठक हुई थी। उस बैठक में पीएम मोदी ने संबंध सुधार के लिए “तीन परस्पर” – परस्पर विश्वास, परस्पर सम्मान और परस्पर संवेदनशीलता की बात कही थी।
इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी चीन का दौरा किया था। इन सभी मुलाकातों का उद्देश्य द्विपक्षीय मुद्दों पर संवाद बढ़ाना और भरोसे की बहाली करना रहा है।
एससीओ के सुरक्षा सलाहकारों की 20वीं बैठक में अजीत डोभाल ने आतंकवाद पर भारत की चिंता खुलकर सामने रखी थी। उन्होंने लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे संगठनों का नाम लेते हुए कहा था कि इनसे उत्पन्न खतरा गहरी चिंता का विषय है और इन पर दोहरे मापदंड छोड़कर निर्णायक कार्रवाई होनी चाहिए।
इसी बैठक के इतर डोभाल की चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात हुई थी, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा और आतंकवाद के खिलाफ साझा प्रयासों पर चर्चा की गई थी। वहीं, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एससीओ की रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान चीनी रक्षा मंत्री एडमिरल डोंग जून से मुलाकात की। इसमें दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने, संवाद बढ़ाने और जटिल मुद्दों को स्थायी वार्ता के जरिए सुलझाने पर बल दिया गया।
राजनाथ सिंह ने कैलाश मानसरोवर यात्रा की पुनः शुरुआत का स्वागत किया और भारत-चीन राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने को एक ऐतिहासिक अवसर बताया। डॉ. जयशंकर की यह यात्रा न केवल भारत-चीन संबंधों को नया मोड़ दे सकती है, बल्कि एससीओ मंच पर भारत की स्थिति को और मजबूत कर सकती है। उनकी चीन यात्रा को कूटनीतिक स्तर पर विश्वास बहाली, सुरक्षा मुद्दों पर स्पष्टता, और क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में संभावित प्रगति के रूप में देखा जा रहा है।
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि इस यात्रा के दौरान द्विपक्षीय संवाद में क्या ठोस पहलें होती हैं और क्या दोनों देश अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर साझा लक्ष्यों की ओर बढ़ सकते हैं।
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