दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अरविंद केजरीवाल की दिल्ली आबकारी नीति घोटाला मामले की सुनवाई से जज के खुद को अलग (रिक्यूज़) करने की मांग की थी उस याचिका को खारिज कर दिया है। करीब 90 मिनट के विस्तृत आदेश में जस्टिस शर्मा ने कहा कि याचिका बेबुनियाद आशंकाओं, अटकलों और गढ़े गए आरोपों पर आधारित है और इसमें किसी वास्तविक हितों के टकराव का प्रमाण नहीं है।=
केजरीवाल और सह-आरोपी मनीष सिसोदिया ने जस्टिस शर्मा के खिलाफ तीन आधारों पर आपत्ति जताते हुए, न्यायाधीश शर्मा के बच्चों का सरकारी पैनल में वकील होना, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद् के कार्यक्रमों में न्यायाधीश का शामिल होन और पूर्व आदेशों में की गई कुछ टिप्पणियां जोड़कर दावा किया था की उन्हें पक्षपात का भय लगता है।
जस्टिस शर्मा ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इनका मामले से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके परिजन न तो इस केस में पेश हुए हैं और न ही किसी रूप में इससे जुड़े हैं।
अपने आदेश में जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस तरह के आरोप न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करने की कोशिश हैं। उन्होंने कहा, “यदि ऐसे आरोपों का जवाब न दिया जाए, तो एक बार जज की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने पर उसे फिर से स्थापित करना कठिन हो जाता है।” उन्होंने यह भी कहा कि किसी जज की क्षमता और निष्पक्षता का आकलन उच्च अदालत करती है, न कि कोई पक्षकार या राजनेता।
अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में शामिल होने के आरोप पर जस्टिस शर्मा ने कहा कि ये कार्यक्रम राजनीतिक नहीं थे, बल्कि कानूनी मुद्दों पर आधारित थे और अतीत में कई न्यायाधीश इनमें शामिल होते रहे हैं। उन्होंने कहा कि केवल व्याख्यान देने के आधार पर पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा कि यदि राजनेताओं के परिवार के सदस्य राजनीति में आ सकते हैं, तो न्यायाधीशों के परिवार के लोगों के पेशेवर जीवन पर सवाल उठाना उचित नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि बिना किसी सबूत के यह नहीं कहा जा सकता कि न्यायिक पद का दुरुपयोग हुआ है।
अंत में, अदालत ने केजरीवाल की याचिका खारिज करते हुए मुख्य मामले की सुनवाई के लिए 29 और 30 अप्रैल की तारीख तय की है।
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