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इज़राइल-लेबनान 10 दिन की संघर्षविराम पर सहमत, लेकिन शांति की राह में बनी हुई हैं कई बड़ी चुनौतियाँ

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पश्चिम एशिया में तनाव के बीच इज़राइल और लेबनान के बीच 10 दिन का संघर्षविराम लागू हो गया है, जिसकी घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की। यह संघर्षविराम शुक्रवार (17 अप्रैल) से प्रभावी हुआ और इससे दोनों देशों के बीच जारी सैन्य टकराव में अस्थायी राहत मिली है। हालांकि, यह विराम कई जटिल चुनौतियों से घिरा हुआ है, जो इसकी स्थिरता पर सवाल खड़े करते हैं।

इस संघर्षविराम को व्यापक क्षेत्रीय घटनाक्रम से भी जोड़ा जा रहा है। इज़राइल और ईरान के बीच तनाव में आई नरमी के बाद अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का रास्ता खुला, जिसके परिणामस्वरूप होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोला गया। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट में कुछ राहत मिली है।

हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि लेबनान में सक्रिय ईरान समर्थित संगठन हिज़्बुल्लाह ने औपचारिक रूप से इस संघर्षविराम को स्वीकार नहीं किया है। संगठन ने शर्त रखी है कि इज़राइल को दक्षिणी लेबनान से पूरी तरह हटना होगा। वहीं इज़राइल ने साफ किया है कि वह हिज़्बुल्लाह को पूरी तरह कमजोर करने के अपने अभियान को अभी खत्म नहीं मानता।

संघर्षविराम समझौते की एक बड़ी आलोचना यह है कि इसमें आत्मरक्षा का अधिकार केवल इज़राइल को दिया गया है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, यह समझौता “सद्भावनापूर्ण वार्ता” को बढ़ावा देने के लिए किया गया है, लेकिन इसमें लेबनान या हिज़्बुल्लाह के लिए समान अधिकार का उल्लेख नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रावधान समझौते को असंतुलित बनाता है।

दूसरी बड़ी चुनौती हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण को लेकर है। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि उनका देश अभी इस संगठन के खिलाफ कार्रवाई खत्म नहीं करेगा। वहीं लेबनान सरकार इस मुद्दे पर सीधे टकराव से बचना चाहती है, क्योंकि इससे देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

तीसरी चुनौती यह है कि इस संघर्षविराम का श्रेय लेने को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है। जहां ट्रंप प्रशासन इसे अपनी कूटनीतिक सफलता बता रहा है, वहीं ईरान का दावा है कि यह समझौता उसके दबाव और हिज़्बुल्लाह के प्रतिरोध का परिणाम है। ईरान के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े अधिकारियों ने भी इस बात का समर्थन किया है।

सबसे जटिल चुनौती यह है कि यह संघर्षविराम व्यापक अमेरिका-ईरान समझौते से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लेबनान इस बड़े समझौते का हिस्सा है, हालांकि अमेरिका और इज़राइल ने इस दावे को खारिज किया है। इसके बावजूद, क्षेत्रीय राजनीति और बाहरी शक्तियों की भूमिका इस समझौते को और जटिल बना रही है।

कुल मिलाकर, यह 10 दिन का संघर्षविराम भले ही अस्थायी राहत लेकर आया हो, लेकिन स्थायी शांति के लिए कई राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक बाधाओं को पार करना अभी बाकी है। दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह अस्थायी विराम स्थायी समाधान में बदल पाएगा या नहीं।

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