एचडीएफसी बैंक ने लीलावती ट्रस्ट के आरोपों को बताया निराधार

एमडी-सीईओ के खिलाफ कार्रवाई की मांग को किया खारिज

एचडीएफसी बैंक ने लीलावती ट्रस्ट के आरोपों को बताया निराधार

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एचडीएफसी बैंक ने शनिवार (7 जून) को लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट (एलकेएमएम ट्रस्ट) की ओर से बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी शशिधर जगदीशन पर लगाए गए गंभीर आरोपों को ‘निराधार और दुर्भावनापूर्ण’ करार देते हुए सख्त शब्दों में खंडन किया है। बैंक ने कहा कि वह अपने सीईओ की छवि और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सभी कानूनी विकल्प अपनाएगा।

लीलावती ट्रस्ट, जो मुंबई के एक प्रमुख अस्पताल का संचालन करता है, ने हाल ही में जगदीशन को आर्थिक अनियमितताओं में शामिल बताते हुए उनके निलंबन और मुकदमा चलाने की मांग की थी। ट्रस्ट का आरोप है कि जगदीशन ने ट्रस्ट के एक मौजूदा सदस्य के पिता को परेशान करने के मकसद से एक पूर्व सदस्य को 2.05 करोड़ रुपये का भुगतान किया था, जिसकी एंट्री हाथ से लिखी एक डायरी में दर्ज की गई थी। ट्रस्ट का दावा है कि यह डायरी उसके सदस्यों ने बरामद की है।

एचडीएफसी बैंक ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि यह पूरा विवाद एक लंबे समय से बकाया ऋण की वसूली से जुड़ा हुआ है। बैंक के प्रवक्ता ने बताया कि ट्रस्टी प्रशांत मेहता और उनके परिवार पर बैंक का बड़ा बकाया है, जिसे अब तक चुकाया नहीं गया है। उन्होंने कहा, “पिछले दो दशकों में बैंक ने ऋण की वसूली और प्रवर्तन को लेकर कानूनी कार्रवाई की है। लेकिन हर बार प्रशांत मेहता और उनके परिवार ने उल्टे बैंक को कानूनी उलझनों में घेरने की कोशिश की।”

प्रवक्ता ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट सहित विभिन्न न्यायिक मंचों पर असफल होने के बाद, अब ट्रस्ट ने बैंक और उसके एमडी पर व्यक्तिगत हमले शुरू कर दिए हैं। उन्होंने कहा, “इन हमलों का मकसद सिर्फ बैंक को डराना और उसके अधिकारियों को बदनाम करना है, ताकि वे बकाया ऋण की वसूली से पीछे हट जाएं।”

एचडीएफसी बैंक का कहना है कि उसने इस पूरे मामले पर कानूनी राय ले ली है और वह न्यायपालिका पर पूरा भरोसा रखता है। प्रवक्ता ने जोर देकर कहा, “हमें विश्वास है कि देश की न्याय प्रणाली ट्रस्ट और उसके पदाधिकारियों के कुटिल उद्देश्यों को समझेगी और हमारे एमडी और बैंक की छवि की रक्षा करेगी।”

इस विवाद ने कॉर्पोरेट बनाम ट्रस्ट की एक नई बहस को जन्म दिया है, जहां एक ओर बड़े वित्तीय संस्थान अपनी कानूनी वसूली की प्रक्रिया को लेकर अड़े हैं, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक ट्रस्ट संस्थाएं उन्हें नैतिक रूप से कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही हैं। अब देखना होगा कि यह मामला आने वाले दिनों में किस दिशा में बढ़ता है।

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