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रिलायंस ने रूसी तेल आयात रोका, यूरोपीय संघ और अमेरिका के दबाव में उठाया कदम

EU बैन और US ‘विंड डाउन’ पीरियड खत्म होने के बाद बड़ा कदम

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यूरोपीय संघ (EU) द्वारा रूस से प्राप्त पेट्रोलियम उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध और संयुक्त राज्य अमेरिका (US) द्वारा तय किए गए ‘विंड डाउन’ पीरियड की समाप्ति के बीच, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (RIL) ने रूसी कच्चे तेल के आयात को औपचारिक रूप से रोक दिया है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक स्तर पर रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर कड़े प्रतिबंध लागू किए जा रहे हैं।

रिलायंस अब तक भारत में रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी आयातक में से एक और देश की सबसे बड़ी फ्यूल एक्सपोर्टर रही है, गुजरात के जामनगर स्थित अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) आधारित रिफाइनरी में लंबे समय से रूसी तेल का उपयोग कर रही थी। कंपनी के प्रवक्ता ने बयान जारी करते हुए कहा, “हमने 20 नवंबर से अपनी SEZ रिफाइनरी में रूसी कच्चे तेल का आयात बंद कर दिया है। 1 दिसंबर से SEZ रिफाइनरी से होने वाले सभी प्रोडक्ट एक्सपोर्ट नॉन-रशियन क्रूड से तैयार होंगे।”

रिलायंस ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव निर्धारित समय सीमा से पहले पूरा किया गया है, ताकि 21 जनवरी 2026 से लागू होने वाले EU के नए उत्पाद-आयात प्रतिबंधों का पूर्ण पालन सुनिश्चित किया जा सके। EU रिलायंस का एक प्रमुख निर्यात बाज़ार है। उसने तीसरे देशों से भी ऐसे सभी पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर बैन लगाया है जो रूसी कच्चे तेल से तैयार किए गए हों। इस कारण रिलायंस को अपने सप्लाई चेन को पूरी तरह बदलना पड़ा।

कंपनी ने बताया कि 22 अक्टूबर 2025 से पहले किए गए सभी रूसी तेल के लिफ्टिंग समझौते पूरे किए जा रहे हैं, क्योंकि उनके लिए परिवहन और प्रोसेसिंग की तैयारियां पहले से पूरी थीं। आखिरी रूसी कार्गो 12 नवंबर को लोड हुआ था। प्रवक्ता ने कहा कि 20 नवंबर के बाद आने वाले किसी भी कार्गो को SEZ के बजाय घरेलू टैरिफ क्षेत्र (DTA) की रिफाइनरी में प्रोसेस किया जाएगा, ताकि सभी गतिविधियां अमेरिकी नियमों और प्रतिबंधों के अनुरूप रहें।

RIL ने रूस की दो प्रमुख ऊर्जा कंपनियों Rosneft और Lukoil से कच्चा तेल लेना भी बंद कर दिया है। US ने 21 नवंबर को इन दोनों कंपनियों के साथ ‘विंड डाउन’ डीलिंग्स खत्म करने की अंतिम समय सीमा तय की थी और पालन न करने पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी थी। इस कदम का उद्देश्य किसी भी तरह के जोखिम, विशेष रूप से अमेरिकी वित्तीय प्रणाली तक पहुंच पर पड़ने वाले प्रभाव को टालना बताया गया है।

रिलायंस का यह निर्णय भारत की ऊर्जा रणनीति के संदर्भ में अहम है, क्योंकि रूस पिछले दो वर्षों में भारत के लिए सस्ता और स्थिर ऊर्जा स्रोत बनकर उभरा था। अब EU और US के दबाव के बाद बड़े भारतीय खिलाड़ी नए सप्लायरों की ओर रुख कर रहे हैं। RIL की तरफ से यह कदम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध व्यवस्था का पालन करने और वैश्विक बाज़ार में अपनी निर्यात स्थिति सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव माना जा रहा है।

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