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भारत-EU ट्रेड डील पर अमेरिका खिसियाया, कहा— “यूरोप फंड कर रहा खुद के खिलाफ युद्ध”

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अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों को नसीहत देने की कोशिश की है कि वे रूस-यूक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से खुद के खिलाफ ही फंडिंग कर रहे हैं। बेसेंट के मुताबिक, भले ही यूरोप ने रूस के साथ प्रत्यक्ष ऊर्जा व्यापार काफी हद तक कम कर दिया हो, लेकिन रूसी कच्चे तेल से भारत में रिफाइन हुए उत्पादों की खरीद के जरिए पैसा अब भी मॉस्को तक पहुंच रहा है।

अमेरिका को यह जलन इसीलिए हो रही क्योंकि, भारत और यूरोपीय संघ (EU) एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के समापन की औपचारिक घोषणा के बेहद करीब हैं। मंगलवार (27 जनवरी) को होने वाले उच्च-स्तरीय शिखर सम्मेलन में इस डील की घोषणा की संभावना जताई जा रही है।

रविवार (26 जनवरी) को मीडिया से बातचीत में बेसेंट ने ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय सामानों पर लगाए गए भारी टैरिफ का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यूरोपीय सरकारें अपनी सुरक्षा नीति को खुद कमजोर कर रही हैं।

बेसेंट ने कहा, “हमने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाए हैं। अंदाजा लगाइए, पिछले हफ्ते क्या हुआ? यूरोप ने भारत के साथ ट्रेड डील साइन कर ली।”

उन्होंने आगे कहा, “और साफ तौर पर समझ लीजिए, रूसी तेल भारत में जाता है, वहां उससे रिफाइंड प्रोडक्ट्स बनते हैं और यूरोप वही रिफाइंड प्रोडक्ट्स खरीदता है। वे खुद के खिलाफ युद्ध को फाइनेंस कर रहे हैं।”

बेसेंट ने इस पूरे मसले को अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच ‘बलिदान के असंतुलन’ के तौर पर पेश कर रहे थे। उनके अनुसार, वॉशिंगटन ने रूस के खिलाफ कड़े टैरिफ लगाए और ऊर्जा क्षेत्र में अलगाव की नीति अपनाई, जबकि यूरोप वैश्विक तेल व्यापार में मौजूद खामियों का आर्थिक फायदा उठाता रहा।

उन्होंने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ने रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए प्रयास किए हैं और अमेरिका ने इस युद्ध की आर्थिक व राजनीतिक कीमत का अनुपातहीन रूप से बड़ा हिस्सा उठाया है।

दौरान करीब दो दशकों से लंबित भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता 2007 में शुरू हुई बातचीत के बाद अब निर्णायक मोड़ पर है। यह डील बदलते वैश्विक व्यापार समीकरणों के बीच भारत-EU आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी की रीढ़ मानी जा रही है।

समझौते से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इसके तहत भारतीय निर्यातकों को कई क्षेत्रों में ड्यूटी-फ्री या रियायती पहुंच मिल सकती है। खासतौर पर टेक्सटाइल, केमिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, इलेक्ट्रिकल मशीनरी, लेदर गुड्स, ऑटोमोबाइल और फुटवियर जैसे श्रम-प्रधान सेक्टरों को इस डील से फायदा होने की उम्मीद है।

ट्रंप प्रशासन ने भारतीय सामानों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए हैं, जिनमें रूस से तेल खरीद से जुड़ा 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है। अगस्त में इन उपायों को दोगुना कर दिया गया, जिससे वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच व्यापारिक तनाव के साथ ही उच्चस्गतरीय नेताओं के बीच तनाव और बढ़ चुका है।

हालांकि, पिछले सप्ताह स्कॉट बेसेंट ने अमेरिकी टैरिफ में कटौती करने का आश्वासन दिया था। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान Politico से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद में तेज गिरावट आई है। उन्होंने कहा था, “भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल की खरीद लगभग ढह गई है। यह एक सफलता है। रूसी तेल पर 25 प्रतिशत टैरिफ अभी भी लागू हैं। मुझे लगता है कि इन्हें हटाने का एक रास्ता मौजूद है।”

आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में भारत का रूसी तेल आयात दो साल के निचले स्तर पर आ गया, जबकि OPEC देशों से आने वाले तेल की हिस्सेदारी 11 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई, जो दिखाता है भारत फिलहाल अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा रूस के अलावा अन्य देशों से पूरा कर रहा है।

दौरान भारत–EU के बीच होने जा रहा अमेरिकी प्रशासन की आंखों में चुभने लगा है ऐसा दिखाई पड़ता है, जबकि अमेरिका खुद भारत से डील करने के कोशिशों में लगा हुआ है।

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