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भारत बना यूरोपीय उद्योग जगत की पहली पसंद, व्यापार और टेक्नोलॉजी में अमेरिका-चीन से भी आगे निकला

नई रिपोर्ट में खुलासा, 58% यूरोपीय कॉरपोरेट प्रमुख भारत को रणनीतिक रूप से सर्वोच्च प्राथमिकता देने के पक्ष में; चीन को लेकर सतर्कता और यूरोप की आर्थिक चुनौतियों ने बदली कारोबारी दिशा

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यूरोप की सबसे बड़ी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी अब भारत को अपने भविष्य के व्यापारिक और रणनीतिक विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण साझेदार मान रहे हैं। द कॉन्फ्रेंस बोर्ड और यूरोपियन राउंड टेबल फॉर इंडस्ट्री (ERT) की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय उद्योग जगत में भारत को लेकर अभूतपूर्व उत्साह देखने को मिल रहा है। रिपोर्ट बताती है कि सर्वे में शामिल 63 प्रतिशत कॉरपोरेट नेताओं ने भारत के दीर्घकालिक कारोबारी माहौल को सकारात्मक बताया, जबकि 7 प्रतिशत ने इसे “बहुत सकारात्मक” माना। इसके विपरीत केवल 4 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने भारत को लेकर नकारात्मक राय व्यक्त की।

रिपोर्ट के अनुसार, 58 प्रतिशत यूरोपीय उद्योग प्रमुखों का मानना है कि यूरोपीय संघ को भारत के साथ अपने संबंधों को व्यापार, निवेश, सप्लाई चेन प्रबंधन, तकनीक, सुरक्षा और जलवायु-ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में “बहुत उच्च प्राथमिकता” देनी चाहिए। यह आंकड़ा अमेरिका के लिए दर्ज 53 प्रतिशत और चीन के लिए 42 प्रतिशत से अधिक है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारत अब यूरोप की बाहरी आर्थिक रणनीति में सबसे ऊपर पहुंच चुका है।

भारत के प्रति यह बढ़ता विश्वास 17 मई 2026 को स्वीडन के गोथेनबर्ग में आयोजित एक महत्वपूर्ण औद्योगिक और कूटनीतिक कार्यक्रम में भी दिखाई दिया। वोल्वो ग्रुप द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपियन राउंड टेबल फॉर इंडस्ट्री को संबोधित किया। कार्यक्रम में स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोप व भारत की कई प्रमुख कंपनियों के शीर्ष अधिकारी मौजूद थे।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर वार्ता के सफल समापन को प्रमुखता से उठाया। इस समझौते को दोनों पक्षों द्वारा एक ऐसे ऐतिहासिक आर्थिक साझेदारी ढांचे के रूप में देखा जा रहा है, जो व्यापार, तकनीकी हस्तांतरण, विनिर्माण विस्तार, सेवाओं और मजबूत सप्लाई चेन के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल सकता है।

भारत की ओर यूरोपीय कंपनियों का झुकाव केवल कूटनीतिक कारणों से नहीं है। देश की तेज आर्थिक वृद्धि, कारोबारी सुगमता पर जोर, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, मजबूत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र और तेजी से विकसित हो रहा इंफ्रास्ट्रक्चर भी इसकी बड़ी वजह हैं। “डिजाइन इन इंडिया, मेक इन इंडिया और एक्सपोर्ट फ्रॉम इंडिया” की नीति के जरिए भारत खुद को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोपीय कंपनियां भारत में परिवहन, लॉजिस्टिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की संभावनाएं तलाश रही हैं। इसके अलावा दूरसंचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और हेल्थकेयर लाइफ साइंसेज जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

भारत की युवा और कुशल कार्यबल को भी यूरोपीय उद्योग भविष्य की आर्थिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण संसाधन मान रहा है। इसी उद्देश्य से भारत-यूरोप सीईओ राउंडटेबल को वार्षिक बनाने और यूरोपियन राउंड टेबल फॉर इंडस्ट्री के भीतर एक समर्पित “इंडिया डेस्क” स्थापित करने जैसे प्रस्ताव सामने आए हैं।

दूसरी ओर, चीन को लेकर यूरोपीय कंपनियों का नजरिया अभी भी पूरी तरह सकारात्मक नहीं है। सर्वे में 34 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने चीन के दीर्घकालिक कारोबारी माहौल को सकारात्मक बताया, जबकि समान प्रतिशत तटस्थ रहा और 23 प्रतिशत ने नकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। हालांकि यह पिछले वर्ष की तुलना में कुछ सुधार दर्शाता है, लेकिन चीन में निवेश और नियामकीय स्थिरता को लेकर संदेह अब भी बना हुआ है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत की ओर बढ़ता यूरोपीय झुकाव यूरोप की अपनी आर्थिक चिंताओं से भी जुड़ा हुआ है। सर्वे में शामिल तीन-चौथाई कॉरपोरेट प्रमुखों को विश्वास नहीं है कि यूरोपीय आयोग के लक्ष्य के अनुसार 2028 तक यूरोपीय सिंगल मार्केट पूरी तरह विकसित हो पाएगा। वहीं 65 प्रतिशत को 2030 तक इसके पूरा होने पर भी गंभीर संदेह है।

यूरोप के दीर्घकालिक कारोबारी माहौल को लेकर भी निराशा दिखाई दी। 60 प्रतिशत से अधिक अधिकारियों ने इसे नकारात्मक बताया, जबकि केवल 11 प्रतिशत ने भविष्य में सकारात्मक सुधार की उम्मीद जताई। ऐसे माहौल में भारत यूरोपीय कंपनियों के लिए स्थिर विकास, नए निवेश और वैश्विक विस्तार का सबसे आकर्षक केंद्र बनकर उभर रहा है।

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