सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट के फैसले को भारत ने किया खारिज, कहा- “अवैध, शून्य और निरर्थक”

भारत बोला- “कथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं, IWT फिलहाल स्थगित ही रहेगी”

सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट के फैसले को भारत ने किया खारिज, कहा- “अवैध, शून्य और निरर्थक”

India rejects Hague Court's decision on Indus Water Treaty, calling it "illegal, void and meaningless"

भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर हेग स्थित कथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) के हालिया फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है। भारत सरकार ने स्पष्ट कहा है कि यह तथाकथित मध्यस्थता निकाय अवैध रूप से गठित किया गया था और उसके किसी भी फैसले का कोई कानूनी महत्व नहीं है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जैसवाल ने शनिवार (17 मई)को मीडिया के सवालों के जवाब में कहा कि 15 मई 2026 को कथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सिंधु जल संधि की सामान्य व्याख्या और अधिकतम तालाब से जुड़े मुद्दों पर एक तथाकथित फैसला जारी किया है, जिसे भारत पूरी तरह अस्वीकार करता है।

उन्होंने कहा, “भारत मौजूदा तथाकथित अवॉर्ड को पूरी तरह से खारिज करता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने गैर-कानूनी तरीके से बनाए गए CoA के पहले के सभी ऐलानों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। भारत ने इस तथाकथित CoA को बनाने को कभी मान्यता नहीं दी है। इसके द्वारा जारी कोई भी कार्रवाई, अवॉर्ड या फैसला अमान्य है। सिंधु जल संधि को रोकने का भारत का फैसला लागू रहेगा।”

सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षरित हुई थी। यह समझौता सिंधु नदी प्रणाली की विभिन्न नदियों के जल उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय करता है। इस संधि को विश्व बैंक की मध्यस्थता में तैयार किया गया था और लंबे समय तक इसे दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण जल समझौता माना जाता रहा।

हालांकि, भारत ने पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद इस संधि को स्थगित (abeyance) करने का फैसला लिया था। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय तरीके से समाप्त नहीं करता, तब तक यह संधि प्रभावी रूप से स्थगित रहेगी।

विदेश मंत्रालय ने जून 2025 में भी स्पष्ट किया था कि संधि स्थगित रहने की स्थिति में भारत अब इसके तहत किसी भी दायित्व का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है। मंत्रालय ने कहा था,“किसी भी आर्बिट्रेशन कोर्ट को, और इस गैर-कानूनी तरीके से बनी आर्बिट्रल बॉडी को, जिसका कानून की नज़र में कोई वजूद नहीं है, यह अधिकार नहीं है कि वह एक सॉवरेन के तौर पर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए भारत के कामों की लीगैलिटी की जांच कर सके।”

यह विवाद जम्मू-कश्मीर में स्थित किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान ने इन परियोजनाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का रास्ता अपनाया था और कथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में मामला उठाया था।

भारत लगातार यह कहता रहा है कि इस तरह का मध्यस्थता मंच स्वयं सिंधु जल संधि का उल्लंघन है। विदेश मंत्रालय ने पहले भी कहा था कि इस तथाकथित अदालत का गठन ही अवैध है और इसके सामने होने वाली पूरी प्रक्रिया कानूनन अमान्य है।

भारत ने पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का दुरुपयोग करने का आरोप भी लगाया है। विदेश मंत्रालय ने पहले कहा था कि पाकिस्तान की यह रणनीति धोखे और अंतरराष्ट्रीय मंचों के राजनीतिक इस्तेमाल की उसकी पुरानी नीति का हिस्सा है। भारत ने पाकिस्तान को वैश्विक आतंकवाद का केंद्र बताते हुए कहा कि इस तरह के दिखावटी कानूनी प्रयासों के जरिए पाकिस्तान अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा है।

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