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Wednesday, May 27, 2026
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पाकिस्तान के तुर्की ड्रोन के खिलाफ भारत की तैयारी, MQ-28 घोस्ट बैट UCAV खरीद पर मंथन तेज

ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका विकसित स्वायत्त कॉम्बैट ड्रोन पर भारतीय वायुसेना की नजर, इंडो-पैसिफिक रणनीति में मिल सकती है नई ताकत

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तुर्की के उन्नत लड़ाकू ड्रोन पाकिस्तान को मिलने की संभावनाओं के बीच भारत अब अपनी मानवरहित युद्ध क्षमता को तेजी से मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत ऑस्ट्रेलिया में विकसित और बोइंग द्वारा निर्मित MQ-28 घोस्ट बैट UCAV (Unmanned Combat Aerial Vehicle) की खरीद पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसे पाकिस्तान द्वारा संभावित रूप से हासिल किए जाने वाले तुर्की के बइरख्तर किज़िलेल्मा ड्रोन का रणनीतिक जवाब माना जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, तुर्की पाकिस्तान को अपने स्टेल्थ क्षमता वाले AI-आधारित मल्टीरोल लड़ाकू ड्रोन किज़िलेल्मा की आपूर्ति आगे बढ़ा सकता है। यदि यह सौदा पूरा होता है तो पाकिस्तान वायुसेना की मानवरहित युद्ध क्षमता में बड़ा बदलाव आ सकता है। इसी पृष्ठभूमि में भारत अपनी हवाई युद्ध रणनीति को भविष्य की जरूरतों के अनुसार अपडेट करने पर ध्यान दे रहा है।

MQ-28 घोस्ट बैट को ऑस्ट्रेलिया की बोइंग और रॉयल ऑस्ट्रेलियाई वायु सेना ने मिलकर विकसित किया है। यह एक “ मानवरहित कोलैबोरेटिव कॉम्बैट एयरक्राफ्ट” है, जिसे मानव संचालित लड़ाकू विमानों और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग प्लेटफॉर्म के साथ मिलकर काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। बोइंग इसे एडवांस्ड एयरपावर सिस्टम्स के लिए फोर्स मल्टीप्लायर बताती है।

घोस्ट बैट की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ओपन-सिस्टम आर्किटेक्चर और मॉड्यूलर डिजाइन है। इसमें मिशन के अनुसार अलग-अलग पेलोड तेजी से बदले जा सकते हैं। इसका मिशनाइज्ड नोज सेक्शन इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, निगरानी, एयर डिफेंस और प्रिसिजन स्ट्राइक जैसे विभिन्न अभियानों के लिए इसे अनुकूल बनाता है।

यह ड्रोन 2,000 नॉटिकल मील यानी लगभग 3,700 किलोमीटर से अधिक दूरी तय करने में सक्षम है। इसकी अधिकतम गति मैक 0.9 तक पहुंच सकती है और यह 40,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर ऑपरेट कर सकता है। करीब 11.7 मीटर लंबा यह प्लेटफॉर्म लगभग 3,175 किलोग्राम वजन का है।

घोस्ट बैट कार्यक्रम को ऑस्ट्रेलिया में पिछले आठ वर्षों से विकसित किया जा रहा है। यह पिछले 50 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में डिजाइन और निर्मित पहला सैन्य लड़ाकू विमान माना जा रहा है। इस परियोजना में 70 से अधिक ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों ने योगदान दिया है।

इस परियोजना को वैश्विक स्तर पर तब बड़ी सफलता मिली जब दिसंबर 2025 में बोइंग और रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स ने AIM-120 अमराम मिसाइल का उपयोग करते हुए पहला स्वायत्त एयर-टू-एयर कॉम्बैट किल परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया। इस परीक्षण में घोस्ट बैट ने बिना प्रत्यक्ष मानवीय नियंत्रण के हवाई लक्ष्य का पता लगाया, उसे ट्रैक किया और निष्क्रिय किया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्षमता इसे दुनिया के सबसे उन्नत UCAV प्लेटफॉर्म में शामिल करती है।

मार्च 2025 तक इसका प्रोटोटाइप 100 से अधिक टेस्ट उड़ानें पूरी कर चुका था और इसके समर्थन में 20,000 घंटे से अधिक डिजिटल सिमुलेशन भी किए गए थे।

भारत की रुचि मई 2026 में कैनबरा में आयोजित भारतीय वायुसेना और रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स के बीच 12वीं एयर स्टाफ वार्ता के दौरान भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। बैठक की तस्वीरों में भारतीय वायुसेना के एयर वाइस मार्शल संजीव तलियान और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एयर वाइस मार्शल स्टीवन पेस के पीछे MQ-28 घोस्ट बैट दिखाई दिया था। वार्ता में संयुक्त अभ्यास, इंटरऑपरेबिलिटी, प्रशिक्षण और भविष्य के एयरोस्पेस सहयोग पर चर्चा हुई।

भारतीय वायुसेना के लिए घोस्ट बैट कई रणनीतिक फायदे प्रदान कर सकता है। इसकी स्वायत्त क्षमता पायलटों के जोखिम को कम करते हुए आक्रामक मिशन योजना को संभव बनाती है। यह Su-30MKI और भविष्य के AMCA जैसे मानव संचालित लड़ाकू विमानों के साथ मिलकर काम कर सकता है, जिससे मैंड- अनमैन्ड टीमिंग अवधारणा को मजबूती मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत घोस्ट बैट को शामिल करता है तो यह केवल तकनीकी बढ़त ही नहीं देगा, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के साथ रणनीतिक साझेदारी और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा सहयोग को भी मजबूत करेगा। पाकिस्तान द्वारा तुर्की के UCAV हासिल करने की कोशिशों के बीच भारत का यह कदम क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने और भविष्य की मानवरहित हवाई युद्ध प्रणाली में बढ़त कायम रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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