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INS विशाल: 2030 के दशक में सुपरकैरीयर बनाना होगा लक्ष्य

नौसैनिक ताकत को नई दिशा

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भारत अपनी नौसैनिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, और प्रस्तावित तीसरा विमानवाहक पोत INS विशाल(IAC-III) इस रणनीति का अहम हिस्सा बनकर उभर रहा है। भारतीय नौसेना औररक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने अप्रैल 2026 तक इस 65,000 से 70,000 टन के पोत के डिजाइन चरण में महत्वपूर्ण प्रगति की है।

हालांकि निर्माण को अभी औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन यह परियोजना 2030 के दशक तक भारत के तीन विमानवाहक पोतों के बेड़े को बनाए रखने की रणनीति के केंद्र में है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना है, खासकर China की तेजी से बढ़ती नौसैनिक क्षमता के मुकाबले।

नई तकनीक और क्षमताओं पर जोर

INS विशाल मौजूदा INS विक्रमादित्य और INS विक्रांत से तकनीकी रूप से बेहद अलग होगा। जहां INS विक्रमादित्य और INS विक्रांत दोनों STOBAR (Short Take-Off But Arrested Recovery) प्रणाली पर आधारित हैं, वहीं INS विशाल को CATOBAR (Catapult Assisted Take-Off But Arrested Recovery) प्रणाली के साथ डिजाइन किया जा रहा है। इससे भारी विमान, एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम, रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट और लंबी अवधि तक उड़ान भरने वाले ड्रोन तैनात किए जा सकेंगे।

DRDO द्वारा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम (EMALS) के छोटे स्तर के परीक्षण सफल रहे हैं, हालांकि इसे पूर्ण पैमाने पर लागू करना अभी तकनीकी और लागत से जुड़ी चुनौतियों के कारण बाकी है।

प्रणोदन और डिजाइन में बदलाव

इस पोत के लिए इंटीग्रेटेड फुल इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन (IFEP) को चुना गया है, जो गैस टर्बाइन से संचालित होगा। पहले विचार किए गए परमाणु प्रणोदन विकल्प को 2017 में छोड़ दिया गया था, क्योंकि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के अनुसार समुद्री रिएक्टर विकसित करने में 15–20 वर्ष लग सकते थे। हालांकि, भारत के दीर्घकालिक रक्षा रोडमैप में 2035 के बाद परमाणु-संचालित विमानवाहक पोतों की संभावना खुली रखी गई है।

INS विशाल के एयर विंग में 30–35 फिक्स्ड-विंग विमान, लगभग 20 हेलीकॉप्टर और 36 घंटे तक उड़ान भरने में सक्षम UAVs शामिल होने की संभावना है। यह प्लेटफॉर्म मैनड-अनमैंड टीमिंग (MUM-T) और नेटवर्क-आधारित युद्ध क्षमता को बढ़ावा देगा।

परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां बजट और तकनीकी निर्भरता हैं। EMALS तकनीक के लिए अमेरिका के साथ सहयोग अनिश्चित बना हुआ है, जबकि लागत भी काफी अधिक है। 2025 में विक्रांत-क्लास के दोहराव (IAC-II) पर विचार किया गया था, लेकिन 2026 में INS विशाल परियोजना को फिर गति मिली है।

भारत का रक्षा मंत्रालय विमानवाहक पोत, पनडुब्बियां और अन्य युद्धपोत शामिल संतुलित नौसेना पर जोर दे रहा है, जिससे इस परियोजना की गति तय होगी। रणनीतिक रूप से INS विशाल भारत की हिंद महासागर और उससे आगे शक्ति प्रक्षेपण क्षमता को मजबूत करेगा। यदि यह 2030 के दशक में कमीशन होता है, तो भारत वैश्विक स्तर पर प्रमुख नौसैनिक शक्तियों की श्रेणी में और मजबूती से स्थापित हो सकेगा।

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