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Tuesday, May 19, 2026
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सुप्रीम कोर्ट सख्त, सार्वजनिक स्थानों से हटाए जाएंगे आवारा कुत्ते

कहा- लोगों की सुरक्षा से समझौता नहीं

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सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों को गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा संकट बताते हुए अपने पुराने आदेश में बदलाव करने से साफ इनकार कर दिया है। मंगलवार (19 मई)को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि वह जमीनी हकीकत से आंखें बंद नहीं कर सकती और नागरिकों के जीवन व सुरक्षा को प्राथमिकता देना सरकारों का संवैधानिक दायित्व है।

शीर्ष अदालत ने नवंबर 2025 में दिए गए अपने ऐतिहासिक आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि स्कूलों, अस्पतालों, कॉलेजों, खेल परिसरों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और अन्य भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश जारी रहेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद इन कुत्तों को दोबारा उन्हीं स्थानों पर नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि उन्हें निर्धारित शेल्टर होम में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

तीन जजों की पीठ ने कहा कि देशभर में बच्चों, बुजुर्गों और यहां तक कि विदेशी पर्यटकों पर भी आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि कई छोटे बच्चों को बुरी तरह नोचा गया, बुजुर्गों पर हमले हुए और सार्वजनिक स्थानों पर भय का माहौल बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें यह अधिकार भी शामिल है कि हर नागरिक बिना डर के सार्वजनिक स्थानों पर स्वतंत्र रूप से आ-जा सके। अदालत ने कहा कि नागरिकों को हर समय कुत्तों के हमले के भय में जीने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

पीठ ने राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी तीखी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा, “राज्य मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता, जबकि मानव जीवन के लिए टाले जा सकने वाले खतरे लगातार बढ़ रहे हों और उनसे निपटने के लिए कानून पहले से मौजूद हों।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि जमीन पर ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’, जहां कमजोर वर्गों को अपनी सुरक्षा खुद करनी पड़ रही है। अदालत के मुताबिक बच्चों और बुजुर्गों को ऐसे खतरों से अकेले नहीं जूझने दिया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से यह भी उल्लेख किया कि डॉग बाइट की समस्या अब केवल गलियों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि एयरपोर्ट, रिहायशी इलाकों और अन्य महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थलों तक फैल चुकी है। अदालत ने कहा कि लगातार सामने आ रही घटनाएं यह दर्शाती हैं कि पहले दिए गए निर्देशों के पालन में गंभीर खामियां हैं।

गौरतलब है कि अदालत ने पहले पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियम के तहत लागू कैप्चर-स्टरलाइज़-टीकाकरण-रिलीज़ (CSVR) मॉडल को भीड़भाड़ वाले इलाकों के लिए स्थगित कर दिया था। कोर्ट का मानना है कि केवल नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उसी इलाके में वापस छोड़ना सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज से पर्याप्त समाधान नहीं है।

अब इस फैसले के बाद राज्यों और नगर निकायों पर अदालत के निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने का दबाव और बढ़ गया है।

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