भारतीय जनता पार्टी ने गुरुवार (29 मई) को कांग्रेस पार्टी पर देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने दावा किया कि 2008 के 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद भारत के पास लश्कर-ए-तैयबा के मुरीदके स्थित मुख्यालय पर हमला करने का अवसर था, लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी के विरोध के कारण उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। भंडारी ने इसे “देशभक्ति के खिलाफ एक बड़ा धोखा” करार दिया।
भंडारी ने अपने दावे को मजबूत करने के लिए पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन की किताब ‘Choices: Inside the Making of India’s Foreign Policy’ के कुछ अंश साझा किए। मेनन के अनुसार, हमलों के बाद हुई उच्चस्तरीय बैठकों में मुरीदके में लश्कर के अड्डों और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी कैंपों पर हमले सहित विभिन्न सैन्य विकल्पों पर विचार हुआ था।
किताब में यह भी उल्लेख है कि तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी जवाबी कार्रवाई के पक्ष में थे। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि “भारत के सारे विकल्प खुले हैं”। शिवशंकर मेनन ने लिखा, “मेरा मानना था कि पाकिस्तान ने एक सीमा पार कर दी है और सामान्य प्रतिक्रिया से अधिक कुछ करना आवश्यक है।”
प्रदीप भंडारी ने कहा कि कांग्रेस नेतृत्व ने, खासकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने, राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देने के बजाय कूटनीतिक निष्क्रियता का रास्ता चुना। उन्होंने आरोप लगाया कि, “प्रणब मुखर्जी के आग्रह के बावजूद, यूपीए सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। यह भारत के साथ विश्वासघात था।”
भाजपा प्रवक्ता ने गांधी परिवार पर और भी कई आरोप लगाए, जिनमें पाकिस्तान के साथ परमाणु सहयोग की संभावनाएं, नेहरू द्वारा भारत को एनएसजी से बाहर रखने का फैसला, और राजीव गांधी के परमाणु निरस्त्रीकरण के रुख को भारत की सुरक्षा रणनीति में कमजोर कड़ी बताया गया।
भंडारी ने कहा, “गांधी-वाड्रा परिवार की विरासत भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौते की रही है। आज जब देश आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम उठा रहा है, यह जानना जरूरी है कि पहले की सरकारों ने क्यों चुप्पी साध ली थी।” इस विवादास्पद बयान पर अब तक कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम राजनीतिक निर्णयों के बहस के केंद्र में आ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिवशंकर मेनन की किताब में किए गए खुलासे और भाजपा द्वारा उठाए गए प्रश्न आगामी चुनावी विमर्श में अहम भूमिका निभा सकते हैं, खासकर जब सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दे फिर से जनता की चिंता के केंद्र में आ रहे हैं।
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