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Wednesday, June 3, 2026
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सावन जप, तप और व्रत का महीना और कांवड़ यात्रा का महत्व?

इस बार वर्ष 2024 में यह व्रत 19 जुलाई 2024, दिन शुक्रवार को किया जा रहा है। इस बार 22 जुलाई 2024 को सावन सोमवार प्रारंभ हो रहा है जिसका समापन 19 अगस्त 2024 को होगा। ज्योतिष गणना के अनुसार इस बार श्रावण मास बहुत ही शुभ योग संयोग में प्रारंभ हो रहा है।

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धार्मिक शास्त्रों के अनुसार प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन एक विशेष व्रत किया जाता है, जिसे मंगला तेरस के नाम से जाना जाता है। इस बार वर्ष 2024 में यह व्रत 19 जुलाई 2024, दिन शुक्रवार को किया जा रहा है। इस बार 22 जुलाई 2024 को सावन सोमवार प्रारंभ हो रहा है जिसका समापन 19 अगस्त 2024 को होगा। ज्योतिष गणना के अनुसार इस बार श्रावण मास बहुत ही शुभ योग संयोग में प्रारंभ हो रहा है। 2 राजयोग सहित कुल छह शुभ योग बन रहे हैं। ऐसे में सोमवार की रात्रि को मात्र 2 उपाय करने से शिवजी होंगे प्रसन्न। श्रावण मास में इस बार 5 सोमवार के 5 महादेव कौन से हैं

सावन का महीना शुरू हो गया है और इसके साथ ही केसरिया कपड़े पहने शिव भक्तों के जत्थे गंगा का पवित्र जल शिवलिंग पर चढ़ाने निकल पड़े हैं। ये जत्थे जिन्हें हम कावड़ियों के नाम से जानते हैं उत्तर भारत में सावन का महीना शुरू होते ही सड़कों पर दिखाई देने लगते हैं। पिछले दो दशकों से कावड़ यात्रा की लोकप्रियता बढ़ी है और अब समाज का उच्च एवं शिक्षित वर्ग भी कावड यात्रा में शामिल होने लगा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कावड़ यात्रा का इतिहास, सबसे पहले कावड़िया कौन थे।

परशुराम थे पहले कावड़िया- कुछ विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित पुरा महादेव का कावड़ से गंगाजल लाकर जलाभिषेक किया था। परशुराम, इस प्रचीन शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाए थे। आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए सावन के महीने में गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर लाखों लोग पुरा महादेव का जलाभिषेक करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर का वर्तमान नाम ब्रजघाट है।

श्रवण कुमार थे पहले कावड़िया वहीं कुछ विद्वानों का कहना है कि सर्वप्रथम त्रेता युग में श्रवण कुमार ने पहली बार कावड़ यात्रा की थी। माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के क्रम में श्रवण कुमार हिमाचल के ऊन क्षेत्र में थे जहां उनके अंधे माता-पिता ने उनसे मायापुरी यानि हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की।  माता-पिता की इस इच्छा को पूरी करने के लिए श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कावड़ में बैठा कर हरिद्वार लाए और उन्हें गंगा स्नान कराया. वापसी में वे अपने साथ गंगाजल भी ले गए। इसे ही कावड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है।

कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान राम पहले कावडिया थे। उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कावड़ में गंगाजल भरकर, बाबा धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। पुराणों के अनुसार कावड यात्रा की परंपरा, समुद्र मंथन से जुड़ी है। समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। परंतु विष के नकारात्मक प्रभावों ने शिव को घेर लिया।

शिव को विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कराने के लिए उनके अनन्य भक्त रावण ने ध्यान किया।तत्पश्चात कावड़ में जल भरकर रावण ने पुरा महादेव स्थित शिवमंदिर में शिवजी का जल अभिषेक किया। इससे शिवजी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हुए और यहीं से कावड़ यात्रा की परंपरा का प्रारंभ हुआ।

कुछ मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल के प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने शिव पर पवित्र नदियों का शीतल जल चढ़ाया था।सभी देवता शिवजी पर गंगाजल से जल लाकर अर्पित करने लगे। सावन मास में कावड़ यात्रा का प्रारंभ यहीं से हुआ।माना जाता है कि शिव को आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है|उन्हें केवल एक लोटा जल चढ़ा कर प्रसन्न किया जा सकता है|वहीं यह भी मान्यता है कि शिव बहुत जल्दी क्रोधित भी होते हैं|लिहाजा ऐसी मान्यता भी है कि इस कांवड़ यात्रा के दौरान मांस, मदिरा, तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए और न ही कांवड़ का अपमान (ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए) किया जाना चाहिए|

कांवड़ यात्रा शिवो भूत्वा शिवम जयेत यानी शिव की पूजा शिव बन कर करो को चरितार्थ करती है|यह समता और भाईचारे की यात्रा भी है|सावन जप, तप और व्रत का महीना है|शिवलिंग के जलाभिषेक के दौरान भक्त पंचाक्षर, महामृत्युंजय आदि मंत्रों का जप भी करते हैं|

भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए भक्त गंगा, नर्मदा, शिप्रा आदि नदियों से जल भर कर उसे एक लंबी पैदल यात्रा कर शिव मंदिर में स्थित शिवलिंग पर उसे चढ़ाते हैं|उत्तराखंड में कांवड़ियों द्वारा हरिद्वार, गोमुख, गंगोत्री से गंगा जल भर कर इसे अपने अपने इलाके के शिवालयों में स्थित शिवलिंगों पर अर्पित करते हैं|तो मध्य प्रदेश के इंदौर, देवास, शुजालपुर आदि जगहों से कांवड़ यात्री वहां की नदियों से जल लेकर उज्जैन में महादेव पर उसे चढ़ाते हैं|

बिहार में कांवड़ यात्रा सुल्तानगंज से देवघर और पहलेजा घाट से मुज़फ़्फ़रपुर तक होती है|बिहार में श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर क़रीब 108 किलोमीटर पैदल यात्रा कर झारखंड के देवघर में बाबा बैद्यनाथ (बाबाधाम) में जल चढ़ाते हैं|वहीं सोनपुर के पहलेजा घाट से मुजफ्फरपुर के बाबा गरीबनाथ, दूधनाथ, मुक्तिनाथ, खगेश्वर मंदिर, भैरव स्थान मंदिरों पर भक्त गंगा जल चढ़ाते हैं|जो कांवड़िए गंगाजल भरने के बाद अगले 24 घंटे के अंदर उसे भोलेनाथ पर चढ़ाने के संकल्प लिए दौड़ते हुए इन शिवालयों में पहुंच कर शिवलिंगों पर यह जल अर्पित करते हैं उन्हें ‘डाक बम’ कहते हैं|

पौराणिक कथाओं के मुताबिक, राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों के उद्धार के लिए जब उनके वंशज भागीरथ यहां से गंगा को लेकर आगे बढ़ रहे थे, तब इसी अजगैबीनाथ में गंगा की तेज धारा से तपस्या में लीन ऋषि जाह्नवी की तपस्या भंग हो गई| इससे क्रोधित होकर ऋषि पूरी गंगा को ही पी गए| बाद में भागीरथ की विनती पर ऋषि ने जंघा को चीरकर गंगा को बाहर निकाला|यहां गंगा को जाह्न्वी के नाम से जाना जाता है|पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, गंगा के उस तट से भगवान राम ने पहली बार भोलेनाथ को कांवड़‍ भरकर गंगा जल अर्पित किया था| आज भी शिवभक्त इस कथा को काफी भक्तिभाव से सुनते हैं| सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी जारी है|

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