भारत ने स्वदेशी रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन (TARA) ग्लाइड बम किट के सफल उड़ान परीक्षण पूरे कर लिए हैं। इस सफलता को भारतीय वायुसेना की लंबी दूरी की सटीक हमलावर क्षमता (प्रिसिजन स्ट्राइक) को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। TARA के जरिए पारंपरिक गुरुत्वाकर्षण आधारित बमों को कम लागत में स्मार्ट और लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियारों में बदला जा सकता है।
हैदराबाद स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) ने इस प्रणाली को विकसित किया है। TARA एक मॉड्यूलर रेंज-एक्सटेंशन किट है, जिसे मौजूदा बिना गाइडेंस वाले बमों पर लगाया जा सकता है। इससे भारतीय वायुसेना को नए और महंगे मिसाइल सिस्टम खरीदने की आवश्यकता कम होगी और पहले से उपलब्ध बम भंडार का अधिक प्रभावी उपयोग संभव हो सकेगा।
इस प्रणाली का परीक्षण जगुआर लड़ाकू विमान से किया जा चुका है। इसे मिराज-2000, सुखोई Su-30MKI और स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमानों के साथ भी एकीकृत करने की योजना है। इससे वायुसेना के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर इसकी तैनाती संभव होगी। TARA 250 किलोग्राम, 450 किलोग्राम और 500 किलोग्राम श्रेणी के पारंपरिक बमों को प्रिसिजन-गाइडेड हथियारों में परिवर्तित कर सकता है।
करीब पांच किलोमीटर की ऊंचाई से छोड़े जाने के बाद TARA अपने पंख और टेल यूनिट को सक्रिय करता है, जिससे यह 150 से 180 किलोमीटर तक ग्लाइड कर सकता है। यह क्षमता लड़ाकू विमानों को दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली की पहुंच से बाहर रहते हुए लक्ष्य पर हमला करने की सुविधा देती है, जिससे पायलटों की सुरक्षा भी बढ़ती है।
TARA में GPS, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल गाइडेंस जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया है। परीक्षणों के दौरान इसकी सटीकता बेहद प्रभावशाली रही और इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) पांच मीटर से कम बताया गया है। इसका अर्थ है कि यह बंकरों, मजबूत सैन्य ठिकानों और रनवे जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों को न्यूनतम सहायक क्षति के साथ निशाना बना सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि TARA का रणनीतिक महत्व काफी बड़ा है। यूक्रेन युद्ध में कम लागत वाले बड़े पैमाने पर निर्मित ग्लाइड बमों ने किलेबंद ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया था, जबकि हमलावर विमानों को अपेक्षाकृत सुरक्षित रखा गया। भारत ने इसी अवधारणा को अपनाकर आधुनिक युद्ध की अर्थव्यवस्था को अपने पक्ष में करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
इस प्रणाली के जरिए भारत कम लागत पर बड़ी संख्या में प्रिसिजन-गाइडेड हथियारों का भंडार तैयार कर सकता है। इससे लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों में महंगी मिसाइलों के भंडार पर निर्भरता कम होगी। वहीं ब्रह्मोस और SCALP जैसी उन्नत एवं महंगी मिसाइलों को केवल उच्च प्राथमिकता वाले लक्ष्यों के लिए सुरक्षित रखा जा सकेगा।
अब तक भारतीय वायुसेना SPICE-2000 और HAMMER जैसी आयातित प्रिसिजन किटों पर निर्भर रही है। TARA इस क्षेत्र में एक स्वदेशी विकल्प प्रदान करता है, जिसे भारतीय उद्योग भागीदारों के सहयोग से डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर मॉडल के तहत विकसित किया गया है। इसकी उत्पादन गतिविधियां भी शुरू हो चुकी हैं, जिससे बड़े पैमाने पर निर्माण और तेज़ी से सैन्य सेवा में शामिल करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
वैश्विक स्तर पर अमेरिका JDAM-ER, रूस UMPK, इजराइल SPICE और चीन LS-6 ग्लाइड बम किट का उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में TARA के साथ इस श्रेणी में भारत की एंट्री यह दर्शाती है कि देश सैन्य नवाचार और आधुनिक युद्धक तकनीकों में वैश्विक रुझानों के साथ कदम मिला रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार TARA भारतीय वायुसेना के लिए एक “वर्कहॉर्स स्मार्ट बम” साबित हो सकता है। यह न केवल मारक क्षमता, जीवित रहने की संभावना और परिचालन लचीलापन बढ़ाता है, बल्कि लागत घटाने और विदेशी निर्भरता कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। स्वदेशी नवाचार और औद्योगिक उत्पादन क्षमता के संयोजन के साथ भारत ने भविष्य के संभावित संघर्षों के लिए अपनी प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता को एक नई मजबूती प्रदान की है।
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