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अमेरिकी नाकेबंदी और भी सख्त: चीनी प्रतिबंधित टैंकर ‘रिच स्टार्री’ होर्मुज़ लौटने को मजबूर

समुद्री व्यापार पर बढ़ी अनिश्चितता

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अमेरिका द्वारा ईरान से जुड़े जहाजों पर लगाए गए प्रतिबंध और नाकेबंदी के बीच एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत आने वाला टैंकर ‘रिच स्टार्री’ खाड़ी क्षेत्र से बाहर निकलने के प्रयास में असफल रहने के बाद दोबारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य की ओर लौट गया।

बताया जा रहा है कि ‘रिच स्टार्री’ उन जहाजों में शामिल था, जो ईरानी बंदरगाहों से निकलकर आगे बढ़ने की कोशिश में था, लेकिन अमेरिकी नाकेबंदी के चलते उन्हें वापस लौटना पड़ा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने जानकारी दी कि नाकेबंदी लागू होने के पहले 24 घंटों में कोई भी जहाज इसे पार नहीं कर सका। साथ ही, छह जहाजों को अमेरिकी बलों के निर्देश पर वापस ईरानी बंदरगाहों की ओर मुड़ना पड़ा।

यह नाकेबंदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रविवार (12 अप्रैल)को घोषित की गई थी, जब इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई वार्ता किसी ठोस समझौते पर नहीं पहुंच सकी। इसके बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है।

रिच स्टार्री लगभग 2.5 लाख बैरल मेथनॉल लेकर चल रहा था। यह कार्गो संयुक्त अरब अमीरात के हमरियाह बंदरगाह से लोड किया गया था। इस टैंकर और इसके मालिक शंघाई शुआनरुन शिपिंग कंपनी पर पहले ही अमेरिका द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने के आरोप में प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं।

मंगलवार(14 अप्रैल) को अमेरिकी नौसेना के एक विध्वंसक जहाज ने ओमान की खाड़ी में स्थित चाबहार बंदरगाह से निकलने की कोशिश कर रहे दो तेल टैंकरों को भी रोक दिया। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि अमेरिका इस नाकेबंदी को सख्ती से लागू कर रहा है।

इसी बीच, एक अन्य अमेरिकी प्रतिबंधित जहाज ‘अलिसिया’ लगभग 20 लाख बैरल तेल ढोने में सक्षम है, बुधवार(15 अप्रैल) को होर्मुज़ जलडमरूमध्य के जरिए खाड़ी में प्रवेश कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह जहाज इराक से तेल लोड करने की योजना बना रहा है।

इस नाकेबंदी का असर वैश्विक शिपिंग और ऊर्जा बाजार पर भी देखने को मिल रहा है। जानकारी के अनुसार, जहां पहले इस मार्ग से रोजाना 130 से अधिक जहाज गुजरते थे, अब यह संख्या 10 से 20 पर आ चुकी  है। इससे शिपिंग कंपनियों, तेल व्यापारियों और बीमा क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है और ऊर्जा कीमतों में और भी उछाल देखने को मिल सकता है।

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