मध्य प्रदेश में वरिष्ठ नौकरशाहों से जुड़ा एक बड़ा भूमि सौदा अब सवालों के घेरे में आ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 50 IAS-IPS अधिकारियों ने भोपाल के कोलार क्षेत्र स्थित गुराड़ी घाट गांव में एक ही दिन कृषि भूमि खरीदी थी। इसके बाद उसी इलाके में ₹3,200 करोड़ की वेस्टर्न बायपास परियोजना को मंजूरी मिली और कुछ समय बाद उस जमीन का उपयोग कृषि से बदलकर रिहायशी कर दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया के बाद जमीन की कीमतों में कथित तौर पर 11 गुना तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला अधिकारियों द्वारा जमा किए गए अचल संपत्ति रिटर्न (IPR) से सामने आया। दस्तावेजों में उल्लेख है कि देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े कई IAS और IPS अधिकारियों ने 4 अप्रैल 2022 को सामूहिक रूप से 2.023 हेक्टेयर कृषि भूमि खरीदी थी। इनमें दिल्ली में तैनात अधिकारी और महाराष्ट्र, तेलंगाना तथा हरियाणा कैडर के अधिकारी भी शामिल बताए गए हैं।
बताया गया है कि इस जमीन की खरीद एक ही दस्तावेज के जरिए की गई थी। कुल 50 हिस्सेदारों के पीछे 41 अलग-अलग खरीदार बताए गए हैं। रजिस्ट्री के समय इस जमीन का मूल्य लगभग ₹5.5 करोड़ दर्ज किया गया, जबकि बाजार मूल्य करीब ₹7.78 करोड़ बताया गया।
IPR दस्तावेजों में इस निवेश को समान सोच वाले अधिकारियों द्वारा किया गया निवेश बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन खरीद के 16 महीने बाद 31 अगस्त 2023 को राज्य कैबिनेट ने इसी क्षेत्र के लिए ₹3,200 करोड़ के वेस्टर्न बायपास प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी। मौजूदा एलाइनमेंट के अनुसार यह बायपास जमीन से लगभग 500 मीटर दूर स्थित है।
जब यह भूमि खरीदी गई थी, तब उसका दर्जा कृषि भूमि का था। हालांकि, बायपास परियोजना को मंजूरी मिलने के लगभग 10 महीने बाद जून 2024 में इस जमीन को रिहायशी श्रेणी में परिवर्तित कर दिया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में लगभग 5 एकड़ यानी करीब 2.17 लाख वर्गफुट कृषि भूमि की कीमत लगभग ₹81.75 प्रति वर्गफुट थी। लेकिन भूमि उपयोग बदलने के बाद जून 2024 में यह दर बढ़कर लगभग ₹557 प्रति वर्गफुट पहुंच गई। इससे 5 एकड़ भूमि का मूल्य बढ़कर करीब ₹12 करोड़ से अधिक हो गया।
वर्तमान में इलाके में जमीन की बाजार दर ₹2,500 से ₹3,000 प्रति वर्गफुट बताई जा रही है। इस हिसाब से अब उस जमीन की कुल कीमत लगभग ₹55 करोड़ से ₹65 करोड़ के बीच आंकी जा रही है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिस उद्देश्य से जमीन को रिहायशी श्रेणी में बदला गया, उस हिसाब से अब तक वहां कोई आवासीय सोसायटी विकसित नहीं हुई है। नियमों के अनुसार किसी रिहायशी परियोजना को शुरू करने से पहले प्लॉट आवंटन या जमीन का सोसायटी के नाम हस्तांतरण आवश्यक होता है।
यह मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों और राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। मामलें में साफ-साफ नज़र आता है की इन IAS-IPS अधिकारियों को बायपास परियोजना और भूमि उपयोग परिवर्तन की जानकारी पहले से थी। हालांकि, इस पूरे मामले में संबंधित अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस कथित भूमि निवेश और बाद में हुए फैसलों की भाजपा सरकार द्वारा स्वतंत्र जांच होगी या नहीं।
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